कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश- षोडश अध्याय एतद्व कथित विप्राः शशिध्वजविमोक्षणम् । कल्केः कथामप्रतिमा शृण्वन्तु विबुधर्षभो ।१। वेदो धर्मं कृतयुग देवलोकश्चराचर । हृष्ट पुष्टाः सुसतुष्टा कल्कौ राजनि चाभवन् ।२। नानादेवादिलिङ्गेषु भूषणैर्भूषितेषु च । इन्द्रजालिकवद्वृत्तिकल्पकाः पूजका जना ।३। न सन्ति मायामोहाढ्या पाखण्डाः साधुवञ्चकाः । तिलकाचितसर्वाङ्गाः कल्कौ राजनि कुत्रचित् ।४, शम्भले वसत्तस्तस्य पद्माया रमया सह । प्राह विष्णुयशाः पुत्रं देवान्यष्टु जगद्धितान् ।५। सूतजी बोले-हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार राजा शशिध्वज को मोक्ष प्राप्ति का प्रसग मैने आपको सुनाया। अब कल्किजी के विचित्र आख्यान को पुनः कहता हूँ, इसे सुनिये ।१। जब भगवान् कल्किजी राज्य सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए, तब वेद, धर्म, सत्युग, देवगण और चराचर युक्त विश्व हृष्ट, एव सतुष्ट हो गया ।२। पूर्व युग मे पूजा करने वाले मनुष्य देव मूर्तियों को विभिन्न प्रकार के वस्त्रालंकारो से अलंकृत करके इन्द्रजाल के समान रहस्य-कल्पना किया करते थे ।३। अब वह माया मोह से आवृत्त साधु वंचक पाखण्ड समाप्त हो गया । कल्किजी के ४७२