कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे परिपूर्ण और रमणीय हो रहे थे । तथा शम्बल ग्राम ससार मे मोक्ष के देने वाला माना जाने लगा था ।५। तत्र कल्किः पुरस्त्रीणा नयनानन्दवर्धन । पद्माया रमया काम रराम जगतीपति. ।६। सुराधिपप्रदत्तेन कामगेन रथेन वै । नदीप्रवंतकुञ्जेषु द्वीपेषु परया मुदा ।७। रममाणो विशन्पद्मारमाद्याभीरमापति ८ पद्मामुखामोदसरोजशीधुवासोपभोगी सुविलासवास. । प्रभूतनीलेन्द्रमणिप्रकाशे गहाविशे प्रविवेश कल्किः ।६। पद्मा तु पद्माशतस्तरूरूपा रमा च पीयूषलकाविलासा । प्रति प्रविष्ट गिरि गह्ववरे ते नारीसहस्तकुलिते त्वगाताम् १० पद्मा पति प्रेक्ष्यगु हानिविष्टं रन्तु मनोज्ञा प्रविवेश पश्चात् रमाबलायूथसमन्विता तत्पश्चाद्गता कलिकमहोग्रकामा नगर निवासिनी नारियो के नयनो की आनन्द-वृद्धि करने वाले कल्किजी पद्मा औररमा के साथ शभल ग्राम मे निवास करते हुए विहार करने लगे ।३। वे मुदित मन से इन्द्र द्वारा दिये हुए रथ पर आरूढ होकर नदी, पर्वत, कुन्ज और द्वीप में पद्मा और रमा प्रभृति नारियो के साथ विहार करते रहे ।७-८। एक समय की बात है—पद्मा के मुख मोद के पद्म-गन्ध का उपभोग करने वाले कल्किजी पर्वत की एक गुफा मे प्रविष्ट हुए जो कि अनेक नीलेन्द मणियों की आभा से प्रकाशित हो रही थो ।६। उनके साथ सहस्त्र सखियो के सहित पद्म और पीयूषकला जैसी विलासिनी रमा भी उस गुफा मे गई ।१०। अपने स्वामो कल्किजी को उस गिरिगुहा में घुसते हुए देख कर मनोहारिणी पद्मा भी उनके पीछे- पीछे गई तथा रमा ने भी विहार की इच्छा से स्त्री यूथो के सहित पीछे से प्रवेश किया ।११। तत्रेन्द्रनीलोत्पलगह्वरान्ते कान्ताभिरात्म प्रतिमाभिदीशम् । कल्किञ्च दृष्ट्वा नवनीरदाभ ततः स्थितं प्रस्तरवन्मुमोह ।१२