कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अध्याय ] [ २६७ शुक ने कहा—हे वरारोहे ! हे रूप यौवन सम्पने तुम कुशल पूर्वक तो हो ? तुम अपने चंचल नेत्रो से सुशोभित द्वितीय लक्ष्मी ही प्रतीत होती हैं ।१६। तुम कमल जैसे मुख वाली, कमलगंधा, कमलाक्ष तथा कमल के समान हाथो वाली हो । अपने हाथ मे तुमने कमल धारण किया हुआ है, यह लक्षण तुम्हारा लक्ष्मी होना सूचित करता है- ।१७। हे वरारोहे ! विधाता ने क्या सम्पूर्ण विश्व का रूप लावण्य तुम्ही मे भर कर तुम्हे ही सब जीवो को मोहित करने वाली बना दियो है ।१८। शुक के यह अद्भुत वचन सुनकर पद्ममालधारिणी पद्मा ने हँस- कर कहा ।१६। तुम कौन हो ? कहाँ से आगमन हुआ है ? तुम इस शुक वेश मे देवता हो अथवा दानव ? तुम यहाँ आकर किसलिए ऐसी दया प्रदर्शित कर रहे हो ।२०। सर्वज्ञोऽह कामगामी सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् । देवगन्धर्वभूपानां सभासु परिपूजित ।२१। चरामि स्वेच्छाया खे त्वामीक्षणार्थमिहागतः । त्वामह हृदि सतप्तं त्यक्तभोग मनस्विनीम् ।२२। हास्यालाप-सखी-सङ्ग देहाभरण-वर्जिताम् । विलोक्याह दोनचेता पृच्छामि श्रोतुमोरितम् । कोकिलालाप-सन्ताप-जनक मधुर मृदु ।२३। तव दन्तौष्ठजिह्वाग्रलुलिताक्षरपक्तय यत्कर्णकुहरे मग्नास्तेषा किं वर्ण्यते तत ।२४। सौकुमार्यं शिरीषस्य क्व कान्तिर्वा निशाकरे । पीयूष क्व वदन्त्येवानन्द ब्रह्मणि ते बुधा, ।२५। शुक ने कहा— देवी ! मैं सब कुछ जानने वाला तथा सब शास्त्रो का तत्वज्ञानी हूँ । मैं स्वेच्छापूर्वक सर्वत्र गमन क'ने मे समथ हूँ । देवता, गधर्व अथवा राजाओ की सभा मे मेरा पूर्ण सम्मान होता है ।२१। मैं गगन मडल मे अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ । तुम हृदय