कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयांश— प्रथम अध्याय इति पद्मावचः श्रुत्वा कीरो धीर सता मतः कल्किदूतः सखीमध्ये स्थिता पद्मामथाब्रवीत् ।१। वद पद्मे साङ्गपूजा हरेरद्भुतकर्मणः । यामास्थाय विधानेन चरामि भुवनत्रयम् ।२। एव पादादि केशान्तं ध्यात्वा त जगदीशवरम् । पूर्णात्मा देशिको मूल मन्त्र जपति मन्त्रवित् ।३। जपादनन्तर दण्ड-प्रणति मतिमाश्ररेत् । विष्वक्सेनादि कानान्तु दत्वा विष्णुनिवेदितम् ।४। तत्त उद्वास्य हृदये स्नापयेन्मनसा सह । नृत्यन्गायन्हरेर्नाम त पश्यन्सर्वत स्थितम् ।५। सूत जी बोले—पद्मा के वचन सुन कर सत्य मत वाले धीर एव कल्कि-दूत शुक ने सखियो के मध्य बैठी हुई पद्मा से कहा ।१। हे पद्मे ! अद्भुत कर्म वाले भगवान विष्णु की पूजा का सांगोपाग वर्णन करो । क्योकि मैं उसका विधिवत् अनुष्ठान करके तीनो लोको मे विचरण करूंगा ।२। पद्मा बोली—इस प्रकार चरणो से केश पर्यन्त भगवान् विष्णु का ध्यान करके मत्र के ज्ञाता को मूल मन्त्र का जप करना चाहिए ।३। जप के पश्चात् भगवान् को दण्डवत् प्रणाम करे । फिर विष्वसेन आदि को पाद्य, अर्घ्य नैवेद्य आदि समर्पित करके भगवान् को निवेदन किये गये वस्त्र को धारणा कर विष्णु का स्मरण करता हुआ नृत्य-गान और हरिनाम का कीर्तन करे ।४-५। ३०८