भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय कल्कि सरोवराभ्यासे जलाहरणवर्त्मनि । स्वच्छस्फटिकसोपाने प्रवालाचितवेदिके ।१। सरोजसौरभव्यग्रभ्रमद्भ्रमरनादिते । कदम्बपालपत्रािल-वारितादित्यदर्शने ।२। समुवासासने चित्रे सदश्वेनावतारितः । कल्किः प्रस्थापयामास शुकं पद्मा श्रममुदा ।३। स नागेश्वरमध्यस्थः शुको गत्वा ददर्श ताम् । हर्म्यस्थां विमिनीपत्रशायिनी सखीभिवृताम् त ।४।। निश्वासवाततापेन म्लायती वदनाम्बुजम् । उत्क्षिपन्ती सखीदत्तकमलचन्दनोक्षिनम् ।५।। सूतजी बोले—कल्किजी ने अश्व से उतर कर सरोवर के समीप वाले जल लाने के मार्ग मे प्रवालों से युक्त, कमल की सुगंध से व्यथित, भ्रमर समूह द्वारा निनादित, उज्ज्वल स्फटिक मणि निर्मित सोपान पर स्थित एव कदम्ब के वृक्षो की नवीन पत्तियो से स्पर्श करती हुई सूर्य किरणो से आच्छादित चबूतरे पर बैठ कर उन्होने शुक को पद्मा के निवास स्थान पर भेजा ।१-३। वहाँ पहुंच कर वह शुक नाग- केशर के वृक्ष पर जा बैठा और उसने अटारी के ऊपर पत्तो की शय्या बनाकर शयन करने वाली पद्मा को सखियो के सहित देखा ।४। उस समय उष्ण वायु के ताप से मलीन मुख हुई पद्मा सखी द्वारा प्रदत्त ३१६