कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय-२ [ ६२३ बृहद्रथ के पास जाकर भगवान् कल्कि के आगमन का वृत्तान्त निवेदन किया ॥५॥ सखीमुखेन पद्मायाः पाणिग्रहणकाम्यया । हरेरागमनश्रुत्वा सहर्षोऽभूद्बृहद्रथः ।६। पुरोधसा ब्राह्मणैश्च पात्रै सुमङ्गलै । वाद्यताण्डवगीतैश्च पूजायोजनपाणिभिः ।७। जगामानयितु कल्कि साद्धं निजजनैः प्रभु । मण्डयित्वा कारूमती पताकास्वर्णतोरणैः ।८। ततो जलाशयाभ्यास गत्वा विष्णुयश सुतम् । मणिवेदिकयासीन भुवनैकगतिं पतिम् ।६। घनाघनोपरि यथा शोभन्ते रुचीराणयहो । विद्युदिन्द्रायुधादीनि तथैव भूषणान्युत ॥१०॥ राजा बृहद्रथ ने पद्मा की सखी के मुख से पद्मा के पाणिग्रहण की कामना से भगवान् का आगमन सुन कर हर्ष व्यक्त किया ।६। फिर उसने पुरोहित, ब्राह्मण, परिवारीजन, मित्र, बन्धु आदि को साथ लेकर मंगल गीत, वाद्य, नृत्य आदि करते हुए कल्कि भगवान को लाने के लिए प्रस्थान किया । स्वर्ण के तोरण और पताकादि से वह कारुमती नगरी अत्यन्त शोभा पाने लगी ।७-८। राजा बृहद्रथ ने जलाशय पर पहुँच कर देखा कि विष्णुयश के पुत्र कल्किजी मणिमय वेदी पर स्थित हैं ।६। जैसे घनघोर मेघ पर बिजली अथवा इन्द्र-धनुष आदि अत्यन्त शोभा पाते हैं, वैसे ही कल्किजी के कृष्णांग पर भूषण दमक रहे हैं ।१०। शरीरे पीतवासाग्रघोरभासा विभूषितम् । रूपलावण्यसदने मदनोद्यमनाशने ॥११॥ ददर्शपुरतो राजा रूपशीलगुणाकरम् । साश्रु सपुलक श्रीश दृष्ट्वा साधु तमर्चयत् ।१२। ज्ञानागोचरमेतन्मे तवागमनमीश्वर ! ।