कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थे अध्याय २ ] [ ३३३ अपनी भार्या के रूप मे प्राप्त करके मैं बडा सन्तुष्ट हुआ और गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करके उस अत्यन्त रूपवती एव माननी स्त्री के वशीभूत हो गया ।२३। फिर कुछ काल बीतने पर मेरे माता-पिता मर गये तब मैंने अपने सुहृदो और ब्राह्मणो के साथ उनका परलोक सस्कार किया।२४। माता-पिता का मृतक सस्कार करके मैंने अनेक ब्राह्मणो को भोजन कराया । फिर उनके विरह से दुःखी होकर मैंने भगवान् विष्णु की आराधना की ।२५। तुष्टो हरिर्मे भगवाञ्जप पूजादिकर्मभि । स्वप्ने मामाह मायेय स्नेहमोहविनिर्मिता ।२६। अय पितेय मातेति ममताकुलचेतसाम् । शोकदु खभयोद्व गजरामृत्युविधायिका ।२७। श्रुत्वैति वचन विष्णोः प्रतिवादार्थमुद्यतम् । मामालक्ष्यन्तर्हित, स विनिद्रोऽहवम् ।२८। सविस्मयः सभार्योऽह त्यक्त्वा ता युरिको पुरोम् पुरुषोत्तमाख्य श्रीविष्णोरालवञ्चागम नृपाः ! ।२६। तत्रैव दक्षिणे पार्श्वे निर्मायाश्रममुत्तमम् । सभार्य्यः सानुगामात्यः करोमि हरिसेवनम् ।३०। मेरे जप, पूजन आदि कर्म से प्रसन्न हुए भगवान् विष्णु ने एक दिन स्वप्न मे मुझसे कहा कि स्नेह, मोह आदि सब मेरी ही माया है ।२६। यह मेरे पिता हैं, यह मेरी माता है' ऐसी ममता जिनके चित्त को व्याकुल करती हो तो समझ लो कि इस शोक, दुख, भय, उद्वेग, वृद्धावस्था और मृत्यु आदि के क्लेश रूप का कारण मेरी माया ही है ।२७। भगवान् की वाणी सुन कर मैं जैसे ही प्रतिवाद करने को हुआ, वैसे ही वे अन्तर्धान होगये और मेरी नीद टूट गई ।२८। हे राजाओ ! फिर मैं विस्मय मे भर कर पुरिका नामक उस पुरी को छोड कर अपनी पत्नी के सहित पुरुषोत्तम सज्ञक विष्णुधाम में जा पहुँचा ।२६। उस पुरुषोत्तम धाम के