भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

३३६ ] [ कल्कि पुराण दृष्ट्वा द्विजवरस्तुष्टो धर्मसारो निजा सुताम् ।४३। दित्सु. कर्माणि वेदज्ञश्चकाराभ्युदयान्द्यपि । वाद्यैर्गीतैश्च नृत्यैश्च स्त्रीगणै. स्वर्णभूषतै. ।४४। अह च पुत्राभ्युदये पितृदेवर्षितर्पणम् । कत्तुं स मुद्रवेलाया प्रविष्ट परमादरात् ।४५। मेरे पाँच पुत्र जय, विजय, कमल, विमल, और बुध इत्यादि नामो से जाने गये ।४१। मैं स्वजनो और पुत्रो से युक्त तथा विविध प्रकार के धनो का स्वामी होकर इन्द्र के समान पूजनीय तथा प्रसिद्ध होगया ।४२। जब मैने अपने ज्येष्ठ पुत्र बुध का विवाह करने ना विचार किया तब धर्मसार नामक एक ब्राह्मण ने अपनी कन्या देने की इच्छा प्रकट की । फिर उसने अपनी कन्या का वैवाहिक सस्कार करने के लिए वेदज्ञ ब्रा- ह्मणो को बुला कर आभ्युदयादि कर्म को पूर्ण कराया । उस समय स्वर्णाभूषणो से विभूषित स्त्रियाँ वाद्य, गीत और नृत्य कर रही थी- ।४३-४४। तब मैं भी पुत्र के अभ्युदय की अभिलाषा करके पितर, देवता और ऋषियो का तर्पण करने के लिए समुद्र के किनारे गया ।४५। वेलालोलायिततनुर्जलादुत्थाय सत्वरः । तीरे सखीन्स्नानसन्ध्या-परान्वीक्ष्याहमुन्मना. ।४६। सद्यः समभव भूपा ! द्वादश्या पारणाहतान् । पुरुषोत्तमसवासान्विष्णो सेवार्थमुद्यतान् ।४७।। तेऽपि मामग्रत, कृत्वा तद्रूपवयसा निधिम् । विस्मयाविष्टमनस दृष्ट्वा मामब्रु वञ्जनाः ।४८। अनन्त ! विष्णो भक्तोऽसि जले कि दृष्टवानिह । स्थले वा व्यग्रमनसं लक्षयाम. कथ तव ।४६। पारणं कुरु तद्ब्रू हि त्यक्त्वा विस्मयमात्मम. । तानब्रुवमह नैव किञ्चिद्ददृष्ट श्रुत जनाः ।५०। कामात्मा तत्कृपाधीर्मया सन्दर्शनादृतः ।