कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
५४२ [ कल्कि-पुराण का अपने पूर्व-जन्मो का वृत्तान्त-कथन, गृद्ध देह प्राप्ति का प्रस ग, कल्किजी के प्रति भक्ति का निवेदन और और राजा शशिश्वज को मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन हुआ है ।२२। विषकन्या का उद्धार, राजाओ का राज्याभिषेक, भगवती माया का स्तव तथा शम्भल ग्राम मे विविध यज्ञो का अनुष्ठान ।२३। तदनन्तर विष्णुयश जी का नारदजी से मोक्ष-विषयक प्रश्न, लोक मे सत्युग का स्थापन और रुक्मिणी व्रत का प्रम ग ।२४। फिर कल्किजी का विहार-वर्णन, पुत्र-पौत्रादि की उत्पत्ति और देव- ताओ तथा गधर्वो के शम्भल ग्राम मे आगमन की कथा कही गई है ।२५। ततो वैकुण्ठगमन विष्णो. कल्केरिहादितम् । शुकप्रस्थान मुचित कथयित्वा कथां शुभा ।२६। गंगास्तोत्रनिह प्रोक्त पुराणे मुनिसमतम् । जगतामानन्दकर पुराण पच लक्षणम् ।२७। चतुवर्ग प्रद कल्कि पुराण परिकीर्तितम् । प्रलयान्ते हरिमुखान्निः सृत लोक विस्तृतम् ।२८। अहोव्यासेन कथित द्विजरूपेणभूतले । विष्णोः कल्केर्भगवत. प्रभाव परमाद्भु तम् ।२९। येभक्त्यात्र पुराणसारममल श्रीविष्णु भावाप्लुत । शृण्वन्तीह वदन्ति वदन्ति साधुसदसि क्षेत्रे सुतीर्थाश्रमे । दत्त्वागा तुरगज गजवर स्वर्णां द्विजायादरात् वस्त्रालङ्करणै प्रपज्यविधिवन्मुक्तास्त एवोत्तमाः ।३०। फिर कल्किजी के वैकुण्ठ-गमन का वर्णन करके शुकदेव जी का कथा समाप्त करके चले जाना कहा गया है ।२६। फिर इस पुराण में मुनियो द्वारा कथित गंगास्तोत्र का वर्णन हुआ है । स सार को आनन्द देने वाला यह पुराण पांच लक्षणो से सम्पन्न है ।२७। यह कल्किपुराण, कीर्तन करने से, चतुवर्ग के देने वाला है । प्रलय के अन्त
एकविंश अध्याय ] [ ५४३ मे यह भगवान् श्रीहरि के मुख से निसृत होकर ससार मे विस्तार को . को प्राप्त हुआ है ।२८। फिर इस पुराण को ब्राह्मण रूप मे पृथिवी पर अवतरित होकर भगवान् वेदव्यासजी ने कहा । इसमे कल्कि स्वरूप भगवान् विष्णु के अत्यन्त अद्भुत प्रभाव का वर्णन किया गया हैं ।२६। सभी पुराणो के सार रूप इस कल्कि पुराण का जो साधुजन भगवान् विष्णु के भक्ति भाव मे मग्न होकर किसी आश्रम या पुण्यतीर्थ मे स्थिति होकर वस्त्रा भूषणो द्वारा ब्राह्मणो का सत्कार करते हुए तथा उन्हे गज, अश्व, गो, आदि धन दान देते हुए श्रवण अथवा कीर्तन करेगे उनको अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी ।३०। श्रुत्वा विधान विधिवद्ब्राह्मणो वेद पारग । क्षत्रियो भूपतिर्वैश्यो धनीशूद्रो महान्भवेत् ।३१। पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्या पठनाच्छ्रवणादपि ।३२। इत्येतत्पुण्यमाख्यान लोमहर्षण जो मुनि । श्रावयित्वामुनीन्भक्त्या ययौ तीर्थाटनादृतः ।३३। शौनको मुनिभिः सार्द्धं सूतमामन्त्र्यधर्मवित् । पुण्यारण्ये हरि ध्यात्वा ब्रह्म प्राप सहर्षिभि ।३४। लोमहर्षणज सर्वपुराणज्ञ यतव्रतम् । व्यासशिष्य मुनिवर त सूत प्रणमाम्यहम् ।३५। इस पुराण के विधी पूर्व क श्रवण करने वाला ब्राह्मण वेद मे पारगत होता है, क्षत्रिय को राज्य की प्राप्ति होती है, वैश्य धनी और शूद्र महान् हो जाता है ।६१। यदि पुत्र की कामना से इसका श्रवण करे तो पुत्र-लाभ, धन की इच्छा वाले को धन लाभ और विद्या के अभिला- षियो को विद्या की प्राप्ति होती है ।३२। लोमहर्षणसुत मुनिवर सूतजी ने भक्ति भाव सहित यह पुण्य आख्यान शौनकादि मुनियो को सुनाया
५४४ ] कल्कि पुराण और फिर तीर्थाटन को चले गये ।३३। इसके पश्चात् मंत्रवित् एवं धर्म- ज्ञाता मुनिवर शौनकजी अन्यान्य मुनियो के सहित भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए ब्रह्म को प्राप्त हो गये ।३४। सर्वं पुराणो के ज्ञाता, व्यासजी के परम शिष्य, लोमहर्षणपुत्र उन मुनिश्रेष्ठ सूतजी को मैं प्रणाम करता हूँ ।३५। आलोक्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इममेव सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदा । ३६। वेद रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।३७। सजलजलददेहो वातवेगैकवाहः करधृतकरवाल. सर्वलोकैकपालः । कलिकुल वनहन्ता सत्यधर्म प्रणेता । कलयतुकुशलवः कल्किरूपः सभूप. ।३८। सभी शास्त्रो के अध्ययन और उन पर बारम्बार विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि सदैव भगवान् श्रीनारायण का ध्यान करना ही श्रेयस्कर है ।६३। क्योकि वेद, पुराण, रामायण और महा भारत आदि सभी शास्त्रो ने अपने आदि, मध्यादि मे सर्वत्र इन्ही भव- वान् श्रीहरि का गुण-कीर्त्तन किया हैं ।३७। जलयुक्त मेघ जैसे वर्ण वाले वायु के समान वेग वाले अश्वारूढ होने वाले, हाथ मे तलवार धारण करने वाले, सत्य- धर्म के प्रणेता, राजाओ के सहित निवास करने वाले कलियुग के परिवार रूपी वन का हनन करने वाले भगवान् कल्किजी हमारा कल्याण करे ।३८। ः श्री कल्कि पुराण सम्पूर्ण ः