कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 305, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 305
- मुण्डकोपनिषद् * २७९ अविद्यारूप गाँठ खुल जाती है, जिसके कारण इसने इस जड शरीरको ही अपना स्वरूप मान रक्खा है । इतना ही नहीं, इसके समस्त संशय सर्वथा कट जाते हैं और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं । अर्थात् यह जीव सब बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त होकर परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—उन परब्रह्मके स्थान और स्वरूपका वर्णन करते हुए उन्हें जाननेका महत्त्व बताते हैं— हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥९॥ तत् = वह, विरजम् = निर्मल, निष्कलम् = अवयवरहित, ब्रह्म = परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे = प्रकाशमय परम कोशमे—परमधाममे ( विराजमान है ); तत् = वह, शुभ्रम् = सर्वथा विशुद्ध, ज्योतिषाम् = समस्त ज्योतियोंकी भी, ज्योतिः = ज्योति है, यत् = जिसको, आत्मविदः = आत्मज्ञानी, विदुः = जानते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या—वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममे विराजमान हैं, वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हे आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं ॥ ९ ॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१०॥ तत्र = वहाँ, न = न ( तो ), सूर्यः = सूर्य, भाति = प्रकाशित होता है, न = न, चन्द्रतारकम् = चन्द्रमा और तारागण ही' न = ( तथा ) न, इमाः = ये, विद्युतः = बिजलियाँ ही, भान्ति = ( वहाँ ) कौधती हैं, अयम् अग्निः कुतः = फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है, तम् भान्तम् एव = ( क्योंकि ) उसके प्रकाशित होनेपर ही ( उसीके प्रकाशसे ), सर्वम् = सब, अनुभाति = प्रकाशित होते हैं, तस्य = उसीके, भासा = प्रकाशसे, इदम् सर्वम् = यह सम्पूर्ण जगत्, विभाति = प्रकाशित होता है ॥ १० ॥ व्याख्या—उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता । जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका आंगिक तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है । चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है । क्योंकि प्राकृत जगत्मे जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं । वे अपने प्रकाशकके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं । सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥ ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥११॥ इदम् = यह, अमृतम् = अमृतरूप, ब्रह्म = परब्रह्म, एव = ही, पुरस्तात् = सामने है, ब्रह्म = ब्रह्म ही, पश्चात् = पीछे है ब्रह्म = ब्रह्म ही, दक्षिणतः = दायीं ओर, च = तथा, उत्तरेण = बायीं ओर, अधः = नीचेकी ओर, च = तथा, ऊर्ध्वम् = ऊपरकी ओर, च = भी, प्रसृतम् = फैला हुआ है, इदम् [ यद् ] = यह जो, विश्वम् = सम्पूर्ण जगत् है, इदम् = यह; वरिष्ठम् = सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्म एव = ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है । सारांश यह कि ये अमृतरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं, इस विश्व- ब्रह्माण्डके रूपमे ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं ॥ ११ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ ॥ द्वितीय मुण्डक समाप्त ॥ २ ॥