भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 832 में से

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पृष्ठ 306

तृतीय मुण्डक प्रथम खण्ड द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १॥ सयुजा=एक साथ रहनेवाले (तथा); सखाया=परस्पर स्वभावगत मित्रतावाले; द्वा=दो सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा), समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते=एक ही वृक्ष (शरीर) का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक तो' पिप्पलम्=उस वृक्षके कर्मरूप फलोंको स्वादु=स्वाद ले-लेकर अत्ति=उपभोग करता है (किंतु); अन्यः=दूसरा; अनश्नन्=न खाता हुआ अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ १ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार गीतामें जगत्‌का अश्वत्थ (पीपल) वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको पीपलके वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। उसी तरहका वर्णन कठोपनिषद्‌में भी गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके नामसे आया है। भाव दोनों जगह प्रायः एक ही है। मन्त्रका भावार्थ यह है कि यह मनुष्य शरीर मानो एक वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षी हैं। ये इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। इन दोनोंमें एक—जीवात्मा तो उस वृक्षके फलरूप अपने कर्म-फलोंको अर्थात् प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको आसक्ति एवं द्वेषपूर्वक भोगता है और दूसरा—ईश्वर उन कर्म- फलोंसे किसी प्रकारका किञ्चित् भी सम्बन्ध न जोड़कर केवल देखता रहता है ॥ १ ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २॥ समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूपी समान वृक्षपर (रहनेवाला); पुरुषः=जीवात्मा; निमग्नः=(शरीरकी गहरी आसक्तिमें) डूबा हुआ है; अनीशया=असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ' मुह्यमानः=मोहित होकर; शोचति= शोक करता रहता है; यदा=जब कभी (भगवान्‌की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=(भक्तोंद्वारा नित्य) सेवित (तथा); अन्यम्=अपनेसे भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको (और); अस्य महिमानम्=उनकी महिमाको; पश्यति=यह प्रत्यक्ष कर लेता है; इति=तब; वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥ व्याख्या—पहले वर्णन किये हुए शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले उन परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, शरीरमें ही आसक्त होकर इसीमें निमग्न हुआ रहता है अर्थात् शरीरमें अतिशय ममता करके उसके द्वारा भोगोंके भोगनेमें ही रचा-पचा रहता है; तबतक असमर्थतारूप दीनतासे मोहित होकर वह नाना प्रकारके दुःख भोगता रहता है। जब कभी भगवान्‌की निर्हेतुकी दयासे अपनेसे भिन्न, नित्य अपने ही समीप रहनेवाले, परम सुहृद्, परमप्रिय और भक्तोंद्वारा सेवित ईश्वरको और उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्‌में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, प्रत्यक्ष कर लेता है, तब तत्काल ही वह सर्वथा शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—ईश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उन्हें जान लेनेका फल बताते हैं— यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्। तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३॥ यदा=जब; पश्यः=यह द्रष्टा (जीवात्मा), ईशम्=सबके शासक; ब्रह्मयोनिम्=ब्रह्माके भी आदि कारण; कर्तारम्=सम्पूर्ण जगत्‌के रचयिता; रुक्मवर्णम्=दिव्य प्रकाशस्वरूप; पुरुषम्=परमपुरुषको; पश्यते=प्रत्यक्ष कर