कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- मुण्डकोपनिषद् * २८१ लेता है; तदा = उस समय; पुण्यपापे = पुण्य-पाप दोनोंको; विधूय = भलीभाँति हटाकर; निरञ्जनः = निर्मल हुआ; विद्वान् = वह ज्ञानी महात्मा; परमम् = सर्वोत्तम; साम्यम् = समताको; उपैति = प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकारसे परमेश्वरकी आश्चर्यमयी महिमाकी ओर दृष्टिपात करके उनके सम्मुख जानेवाला द्रष्टा (जीवात्मा) जब सबके नियन्ता, ब्रह्माके भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, दिव्य प्रकाश- स्वरूप परमपुरुष परमेश्वरका साक्षात् कर लेता है, उस समय वह अपने समस्त पुण्य-पापरूप कर्मोंका समूल नाशकर उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर परम निर्मल हुआ ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त हो जाता है। गीताके बारहवें अध्यायमें श्लोक १३ से १९ तक इस समताका कई प्रकारसे वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥ प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी। आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥ एषः = यह (परमेश्वर), हि = ही; प्राणः = प्राण है, यः = जो; सर्वभूतैः = सब प्राणियोंके द्वारा; विभाति = प्रकाशित हो रहा है; विजानन् = (इसको) जाननेवाला, विद्वान् = ज्ञानी; अतिवादी = अभिमानपूर्वक बढ़-बढ़कर बातें करनेवाला; न भवते = नहीं होता (किंतु वह); क्रियावान् = यथायोग्य भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता हुआ, आत्मक्रीडः = सबके आत्मरूप अन्तर्यामी परमेश्वरमें क्रीडा करता रहता है (और); आत्मरतिः = सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वरमें ही रमण करता रहता है; एषः = यह (ज्ञानी भक्त); ब्रह्मविदाम् = ब्रह्मवेत्ताओंमें भी; वरिष्ठः = श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ व्याख्या—ये सर्वव्यापी परमेश्वर ही सबके प्राण हैं; जिस प्रकार शरीरकी सारी चेष्टाएँ प्राणके द्वारा होती हैं, उसी प्रकार इस विश्वमें भी जो कुछ हो रहा है, परमात्माकी शक्तिसे ही हो रहा है। समस्त प्राणियोंमें भी उन्हींका प्रकाश है, वे ही उन प्राणियोंके द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। इस बातको समझनेवाला ज्ञानी भक्त कभी बढ़-बढ़कर बातें नहीं करता। क्योंकि वह जानता है कि उसके अंदर भी उन सर्वव्यापक परमात्माकी ही शक्ति अभिव्यक्त है; फिर वह किस बातपर अभिमान करे। वह तो लोकसंग्रहके लिये भगवदाज्ञानुसार अपने वर्ण, आश्रमके अनुकूल कर्म करता हुआ सबके आत्मा अन्तर्यामी भगवान्में ही क्रीड़ा करता है। वह सदा भगवान्से ही रमण करता है। ऐसा यह भगवान्का ज्ञानी भक्त ब्रह्मवेत्ताओंमें भी अति श्रेष्ठ है। गीतामें भी सबको वासुदेवरूप देखनेवाले ज्ञानी भक्तको महात्मा और सुदुर्लभ बताया गया है (७। १९) ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उन परमात्माकी प्राप्तिके साधन बताते हैं— सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५॥ एषः = यह; अन्तःशरीरे हि = शरीरके भीतर ही (हृदयमें विराजमान); ज्योतिर्मयः = प्रकाशस्वरूप (और); शुभ्रः = परम विशुद्ध; आत्मा = परमात्मा, हि = निस्सन्देह; सत्येन = सत्य-भाषण; तपसा = तप (और); ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्य- पूर्वक; सम्यग्ज्ञानेन = यथार्थ ज्ञानसे ही; नित्यम् = सदा; लभ्यः = प्राप्त होनेवाला है; यम् = जिसे; क्षीणदोषाः = सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए; यतयः = यत्नशील साधक ही; पश्यन्ति = देख पाते हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—सबके शरीरके भीतर हृदयमें विराजमान परम विशुद्ध प्रकाशमय ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जिनको सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए प्रयत्नशील साधक ही जान सकते हैं, सदैव सत्य-भाषण, तपश्चर्या, संयम और स्वार्थत्याग तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे उत्पन्न यथार्थ ज्ञानद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इनसे रहित होकर जो भोगोंमें आसक्त हैं, भोगोंकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके मिथ्याभाषण करते हैं और आसक्तिवश नियमपूर्वक अपने वीर्यकी रक्षा नहीं कर सकते, वे स्वार्थपरायण अविवेकी मनुष्य उन परमात्माका अनुभव नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनको चाहते ही नहीं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—पूर्वोक्त साधनोंमेंसे सत्यकी महिमा बताते हैं— उ० मं० ३६—