कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥ सत्यम् = सत्य एव = ही जयति = विजयी होता है, अनृतम् = झूठ, न = नहीं; हि = क्योकि देवयानः = वह देवयान नामक; पन्थाः = मार्ग, सत्येन = सत्यसे, विततः = परिपूर्ण है; येन = जिससे, आप्तकामाः = पूर्णकाम, ऋषयः = ऋषिलोग ( वहाँ ), आक्रमन्ति = गमन करते हैं, यत्र = जहाँ, तत् = वह सत्यस्य = सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका, परमम् = उत्कृष्ट निधानम् = धाम है ॥ ६ ॥ व्याख्या - सत्यकी ही विजय होती है. झूठकी नहीं। अभिप्राय यह है कि परमात्मा सत्यस्वरूप है, अतः उनकी प्राप्तिके लिये मनुष्यमें सत्यकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये । परमात्माप्राप्तिके लिये तो सत्य अनिवार्य साधन है ही. जगत्के दूसरे सब कार्योंमें भी अन्ततः सत्यकी ही विजय होती है झूठकी नहीं। जो लोग मिथ्या भाषण, दम्भ और कपटसे उन्नतिकी आशा रखते हैं, वे अन्तमें बुरी तरहसे निराश होते हैं । मिथ्या-भाषण और मिथ्या आचरणोंमें भी जो सत्यका आभास है, जिनके कारण दूसरे लोग उसे किसी अंशमें सत्य मान लेते हैं, उसीसे कुछ क्षणिक लाभ-सा हो जाता है। परन्तु उसका परिणाम अच्छा नहीं होता । अन्तमे सत्य सत्य ही रहता है और झूठ झूठ ही । इसीसे बुद्धिमान् मनुष्य सत्यभाषण और सदाचारको ही अपनाते हैं, झूठको नहीं क्योंकि जिनकी भोग-वासना नष्ट हो गयी है, ऐसे पूर्णकाम ऋषिलोग जिस मार्गसे वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ इस सत्यके परमाधार परब्रह्म परमात्मा स्थित हैं, वह देवयान मार्ग अर्थात् उन परमदेव परमात्माको प्राप्त करनेका साधनरूप मार्ग सत्यसे ही परिपूर्ण है, उसमें असत्य-भाषण और दम्भ, कपट आदि असत् आचरणोंके लिये स्थान नहीं है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - उपर्युक्त साधनोंसे प्राप्त होनेवाले परमात्माके स्वरूपका पुनः वर्णन करते हैं- बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥ तत् = वह परब्रह्म, बृहत् = महान्, दिव्यम् = दिव्य, च = और; अचिन्त्यरूपम् = अचिन्त्यस्वरूप है, च = तथा; तत् = वह, सूक्ष्मात् = सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतरम् = अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें विभाति = प्रकाशित होता है, तत् = ( तथा ) वह; दूरात् = दूरसे भी, सुदूरे = अत्यन्त दूर है; च = और, इह = इस (शरीर) में रहकर, अन्तिके च = अति समीप भी है; इह = यहाँ, पश्यत्सु = देखनेवालोंके भीतर; एव = ही, गुहायाम् = उनकी हृदयरूपी गुफामें, निहितम् = स्थित है ॥ ७ ॥ व्याख्या - वे परब्रह्म परमात्मा सबसे महान् दिव्य - अलौकिक और अचिन्त्यस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप मनके द्वारा चिन्तनमें आनेवाला नहीं है। अतः मनुष्यको श्रद्धापूर्वक परमात्माकी प्राप्तिके पूर्वोक्तथित साधनोंमें लगे रहना चाहिये । साधन करते-करते वे परमात्मा अचिन्त्य एवं सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी स्वयं अपने स्वरूपको हृदयमें प्रकाशित कर देते हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं; ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ वे न हो। अतः वे दूरसे भी दूर हैं, अर्थात् जहाँतक हमलोग दूरका अनुभव करते हैं, वहाँ भी वे हैं और निकटसे भी निकट, यहीं अपने भीतर ही हैं। अधिक क्या, देखनेवालोंमें ही उनके हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। अतः उन्हे खोजनेके लिये कहीं दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७ ॥ न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥ न चक्षुषा = ( वह परमात्मा) न तो नेत्रोंसे, न वाचा = न वाणीसे (और), न अन्यैः = न दूसरी, देवैः = इन्द्रियोंते. अपि = ही; गृह्यते = ग्रहण करनेमें आता है ( तथा ), तपसा = तपसे; वा = अथवा कर्मणा = कर्मोंसे भी ( वह ), [ न गृह्यते = ग्रहण नहीं किया जा सकता, ] तम् = उस, निष्कलम् = अवयवरहित (परमात्मा) को, तु = तो; विशुद्धसत्त्वः = विशुद्ध अन्तःकरणवाला (साधक), ततः = उस विशुद्ध अन्तःकरणसे, ध्यायमानः = (निरन्तर उसका) ध्यान करता हुआ ही, ज्ञानप्रसादेन = ज्ञानकी निर्मलतासे, पश्यते = देख पाता है ॥ ८ ॥