कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- मुण्डकोपनिषद् * २८३
व्याख्या—उन परब्रह्मको मनुष्य इन आँखोंसे नहीं देख सकता; इतना ही नहीं, वाणी आदि अन्य इन्द्रियोंद्वारा भी वे पकड़मे नहीं आ सकते । तथा नाना प्रकारकी तपश्चर्या और कर्मोंके द्वारा भी मनुष्य उन्हें नहीं पा सकता । उन अवयवरहित परम विशुद्ध परमात्माको तो मनुष्य सब भोगोंसे मुख मोड़कर, निःस्पृह होकर विशुद्ध अन्तःकरणके द्वारा निरन्तर एकमात्र उन्हींका ध्यान करते-करते ज्ञानकी निर्मलतासे ही देख सकता है। अतः जो उन परमात्माको पाना चाहे, उसे उचित है कि संसारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उन सबकी कामनाका त्याग करके एकमात्र परब्रह्म परमात्माको ही पानेके लिये उन्हींके चिन्तनमें निमग्न हो जाय ॥ ८ ॥
सम्बन्ध—जब वे परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें रहते हैं, तब सभी जीव उन्हें क्यों नहीं जानते ? शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष ही क्यों जानता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥
यस्मिन्=जिसमें; पञ्चधा=पाँच भेदोंवाला, प्राणः=प्राण; संविवेश=भलीभाँति प्रविष्ट है (उसी शरीरमें रहनेवाला); एषः=यह; अणुः=सूक्ष्म; आत्मा=आत्मा, चेतसा=मनसे, वेदितव्यः=जाननेमें आनेवाला है, प्रजानाम्=प्राणियोंका (वह ); सर्वम्=सम्पूर्ण, चित्तम्=चित्त; प्राणैः=प्राणोंसे; ओतम्=व्याप्त है, यस्मिन् विशुद्धे=जिस अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर, एषः=यह; आत्मा=आत्मा; विभवति=सब प्रकारसे समर्थ होता है ॥ ९ ॥
व्याख्या—जिस शरीरमें प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच भेदोंवाला प्राण प्रविष्ट होकर उसे चेष्टायुक्त कर रहा है, उसी शरीरके भीतर हृदयके मध्यभागमें मनद्वारा ज्ञातारूपसे जाननेमें आनेवाला यह सूक्ष्म जीवात्मा भी रहता है । परंतु समस्त प्राणियोंके समस्त अन्तःकरण प्राणोंसे ओतप्रोत हो रहे हैं, अर्थात् इन प्राण और इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये उत्पन्न हुई नाना प्रकारकी भोगवासनाओंसे मलिन और क्षुब्ध हो रहे हैं, इस कारण सब लोग परमात्माको नहीं जान पाते । अन्तःकरणके विशुद्ध होनेपर ही यह जीवात्मा सब प्रकारसे समर्थ होता है । अतः यदि भोगोंसे विरक्त होकर यह परमात्माके चिन्तनमें लग जाता है, तब तो परमात्माको प्राप्त कर लेता है, और यदि भोगोंकी कामना करता है तो इच्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥१०॥
विशुद्धसत्त्वः=विशुद्ध अन्तःकरणवाला ( मनुष्य ), यम् यम्=जिस-जिस, लोकम्=लोकको, मनसा=मनसे, संविभाति=चिन्तन करता है; च=तथा; यान् कामान् कामयते=जिन भोगोंकी कामना करता है, तम् तम्=उन-उन, लोकम्=लोकोंको, जयते=जीत लेता है, च=और, तान् कामान्=उन ( इच्छित ) भोगोंको भी, [ जयते=प्राप्त कर लेता है, ] तस्मात् हि=इसीलिये; भूतिकामः=ऐश्वर्यकी कामनावाला मनुष्य, आत्मज्ञम्=शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले महात्माका, अर्चयेत्=सत्कार करे ॥ १० ॥
व्याख्या—विशुद्ध अन्तःकरणवाला मनुष्य यदि भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस निर्मल अन्तःकरणद्वारा निरन्तर परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करता है—तब तो उन्हें प्राप्त कर लेता है, यह बात आठवे मन्त्रमे कही जा चुकी है, परंतु यदि वह सर्वथा निष्काम नहीं होता तो जिस-जिस लोकका मनसे चिन्तन करता है तथा जिन-जिन भोगोंको चाहता है, उन-उन लोकोंको ही जीतता है—उन्हीं लोकोंमें जाता है तथा उन-उन भोगोंको ही प्राप्त करता है, इसलिये ऐश्वर्यकी कामनावाले मनुष्यको शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले विशुद्ध अन्तःकरणयुक्त विवेकी पुरुषकी सेवा-पूजा ( आदर-सत्कार ) करनी चाहिये, क्योंकि वह अपने लिये और दूसरोंके लिये भी जो-जो कामना करता है, वह पूर्ण हो जाती है ॥ १० ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥