भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 832 में से

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पृष्ठ 310

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२८४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * द्वितीय खण्ड सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधककी सामर्थ्यका वर्णन करनेके लिये प्रसङ्गवश कामनाओंकी पूर्तिकी बात आ गयी थी, अतः निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा करते हुए पुनः प्रकरण आरम्भ करते हैं— स वेदैतत्परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥ सः=वह (निष्काम भाववाला पुरुष); एतत्=इस; परमम्=परम; शुभ्रम्=विशुद्ध (प्रकाशमान); ब्रह्मधाम= ब्रह्मधामको; वेद=जान लेता है; यत्र=जिसमें; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत्; निहितम्=स्थित हुआ; भाति=प्रतीत होता है; ये हि=जो भी कोई; अकामाः=निष्काम साधक; पुरुषम् उपासते=परम पुरुषकी उपासना करते हैं; ते=वे; धीराः= बुद्धिमान्; शुक्रम्=रजोवीर्यमय; एतत्=इस जगत्‌को; अतिवर्तन्ति=अतिक्रमण कर जाते हैं ॥ १ ॥ व्याख्या—थोड़ा-सा विचार करनेपर प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्यकी समझमें यह बात आ जाती है कि इस प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले जगत्‌के रचयिता और परमाधार कोई एक परमेश्वर अवश्य हैं। इस प्रकार जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता है, उन परम विशुद्ध प्रकाशमय धामस्वरूप परब्रह्म परमात्माको समस्त भोगोंकी कामनाका त्याग करके निरन्तर उनका ध्यान करनेवाला साधक जान लेता है। यह बात निश्चित है कि जो मनुष्य उन परम पुरुष परमात्माकी उपासना करते, एकमात्र उन्हींको चाहते हैं, वे इस रजोवीर्यमय (भोगमय) जगत्‌को लाँघ जाते हैं; किसी प्रकारके भोगोंमें उनका मन नहीं अटकता; वे सर्वथा पूर्ण निष्काम होकर रहते हैं। इसीलिये उन्हें बुद्धिमान् कहा गया है, क्योंकि जो सार वस्तुके लिये असारको त्याग दे; वही बुद्धिमान् है* ॥ १ ॥ सम्बन्ध—अब सकाम पुरुषकी निन्दा करते हुए ऊपर कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं— कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र। पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥ यः=जो; कामान्=भोगोंको; मन्यमानः=आदर देनेवाला मानव; कामयते=(उनकी) कामना करता है; सः=वह; कामभिः=उन कामनाओंके कारण; तत्र तत्र=उन-उन स्थानोंमें; जायते=उत्पन्न होता है (जहाँ वे उपलब्ध हो सकें); तु=परंतु; पर्याप्तकामस्य=जो पूर्णकाम हो चुका है, उस; कृतात्मनः=विशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषकी; सर्वे=सम्पूर्ण; कामाः=कामनाएँ; इह एव=यहाँ; प्रविलीयन्ति=सर्वथा विलीन हो जाती हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—जो भोगोंको आदर देनेवाला है, जिसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके भोग सुखके हेतु हैं, वही भोगोंकी कामना करता है और नाना प्रकारकी कामनाओंके कारण ही जहाँ-जहाँ भोग उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ-वहाँ कर्मानुसार उत्पन्न होता है; परंतु जो भगवान्‌को चाहनेवाले भगवान्‌के प्रेमी भक्त पूर्णकाम हो गये हैं; इस जगत्‌के भोगोंसे ऊब गये हैं; उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले भक्तोंकी समस्त कामनाएँ इस शरीरमें ही विलीन हो जाती हैं। स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि भोगोंकी ओर नहीं जाती। फलतः उन्हें शरीर छोड़नेपर नवीन जन्म नहीं धारण करना पड़ता। वे भगवान्‌को पाकर जन्म- मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ २ ॥

  • एक आदरणीय महानुभावने यह अर्थ किया है— 'वह (आत्मज्ञ) समस्त कामनाओंके उत्कृष्ट आश्रयभूत उस ब्रह्मको जानता है, जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् अर्पित है और जो स्वय
  • शुद्धरूपसे प्रकाशित हो रहा है। उस इस प्रकारके आत्मज्ञ पुरुषकी भी जो लोग निष्काम भावसे मुमुक्षु होकर परमदेवके समान उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान् पुरुष शरीरके उपादान कारणरूप मनुष्यदेहके बीजको अतिक्रमण कर जाते हैं अर्थात् फिर योनिमें प्रवेश नहीं करते।'