कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- मुण्डकोपनिषद् * २८५ सम्बन्ध—पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं— नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥ ३॥ अयम् = यह; आत्मा = परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन = न तो प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; एषः = यह; यम् = जिसको; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव = उसके द्वारा ही; लभ्यः = प्राप्त किया जा सकता है; (क्योंकि) एषः = यह; आत्मा = परमात्मा, तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनुम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं; न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धि- के अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं, और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वय स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता । परंतु जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमाया- का परदा हटाकर उसके सामने अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें प्रकट हो जाते हैं* ॥ ३ ॥ नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ॥४॥ अयम् = यह; आत्मा = परमात्मा; बलहीनेन = बलहीन मनुष्यद्वारा, न लभ्यः = नहीं प्राप्त किया जा सकता, च = तथा; प्रमादात् = प्रमादसे; वा = अथवा, अलिङ्गात् = लक्षणरहित; तपसः = तपसे, अपि = भी, न [लभ्यः]=नहीं प्राप्त किया जा सकता; तु = किंतु; यः = जो; विद्वान् = बुद्धिमान् साधक; एतैः = इन; उपायैः = उपायोंके द्वारा; यतते = प्रयत्न करता है; तस्य = उसका, एषः = यह; आत्मा = आत्मा; ब्रह्मधाम = ब्रह्मधाममें, विशते = प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस प्रकरणमें बताये हुए सबके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वर उपासनासूप बलसे रहित मनुष्यद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते । समस्त भोगोंकी आशा छोड़कर एकमात्र परमात्माकी ही उत्कट अभिलाषा रखते हुए निरन्तर विशुद्धभावसे अपने इष्टदेवका चिन्तन करना—यही उपासनारूपी बलका सचय करना है। ऐसे बलसे रहित पुरुषको वे नहीं मिलते । इसी प्रकार कर्तव्यत्यागरूप प्रमादसे भी नहीं मिलते तथा सात्त्विक लक्षणोंसे रहित सयमरूप तपसे भी किसी साधकद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते । किंतु जो बुद्धिमान् साधक इन पूर्वोक्त उपायोंसे प्रयत्न करता है, अर्थात् प्रमादरहित होकर उत्कट अभिलाषाके साथ निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके लक्षण बतलाते हैं—
- एक आदरणीय महानुभावने इसका यह अर्थ माना है— 'यह आत्मा न तो वेद-शास्त्रके अधिक अध्ययनरूप प्रवचनसे प्राप्त होनेयोग्य है, न ग्रन्थके अर्थको धारण करनेकी शक्ति मेधासे अथवा न अधिक शास्त्र-श्रवणसे ही । यह विद्वान् जिस परमात्माको वरण करता—प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, उस इच्छासे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है । नित्य प्राप्त होनेके कारण अन्य किसी साधनसे वह प्राप्त नहीं हो सकता । यह आत्मा उसके प्रति अपने आत्मस्वरूपको प्रकट कर देता है । जिस प्रकार प्रकाशमें घटादिकी अभिव्यक्ति होती है, उसी प्रकार निष्ठाकी प्राप्ति होनेपर आत्माका आविर्भाव हो जाता है ।