कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥ वीतरागाः = सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मानः = (और) विशुद्ध अन्त.करणवाले; ऋषयः = ऋषिलोग. एनम् = इस परमात्माको; संप्राप्य = पूर्णतया प्राप्त होकर ज्ञानतृप्ताः = ज्ञानसे तृप्त (एव); प्रशान्ताः = परम शान्त (हो जाते हैं), युक्तात्मानः = अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते = वे; धीराः = ज्ञानीजन सर्वगम् = सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वतः = सब ओरसे प्राप्य = प्राप्त करके, सर्वम् एव = सर्वरूप परमात्मामे ही आविशन्ति = प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या-वे विशुद्ध अन्त करणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारने इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हे किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरने प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामे ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-उस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमे जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्ति- का वर्णन करते हैं- वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥ [ये] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः = जिन्होने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्मा- को पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा) संन्यासयोगात् = कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगमे; शुद्धसत्त्वाः = जिनका अन्त करण शुद्ध हो गया है, ते = वे; सर्वे = समस्त यतयः = प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले = मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु = ब्रह्मलोकमे (जाते हैं और वहाँ) परामृताः = परम अमृतरूप होकर परिमुच्यन्ति = सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या-जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मानक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तकरण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतरूप होकर संसार- बन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है-इस जिज्ञासापर कहते है- गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७॥ पञ्चदश = पंद्रह; कलाः = कलाएँ; च = और; सर्वे = सम्पूर्ण, देवाः = देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु = अपने- अपने अभिमानी देवताओंमें; गताः = जाकर प्रतिष्ठाः = स्थित हो जाते हैं; कर्माणि = (फिर) समस्त कर्म; च = और विज्ञानमयः = विज्ञानमय, आत्मा = जीवात्मा; सर्वे = ये सब के-सब; परे अव्यये = परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति = एक हो जाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या-उस महापुरुषका जब देहपात होता है उस समय पन्द्रह कलाएँ * और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता-
- पद्रह कलाएँ ये हैं-प्राण, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)