भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

ॐ मुण्डकोपनिषद् ॐ २८७ ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं । उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता । उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं॥७॥ सम्बन्ध—किस प्रकार लीन हो जाते हैं, इस जिज्ञासापर कहते हैं— यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८॥ यथा=जिस प्रकार; स्यन्दमानाः=बहती हुई; नद्यः=नदियाँ; नामरूपे=नाम-रूपको; विहाय=छोड़कर; समुद्रे= समुद्रमें; अस्तम् गच्छन्ति=विलीन हो जाती हैं; तथा=वैसे ही; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; नामरूपात्=नाम-रूपसे; विमुक्तः= रहित होकर; परात् परम्=उत्तम-से-उत्तम; दिव्यम्=दिव्य; पुरुषम्=परमपुरुष परमात्माको; उपैति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥ व्याख्या—जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूपसे रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है—सर्वतोभावसे उन्हींमें विलीन हो जाता है ॥ ८ ॥ स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥ ह=निश्चय ही; यः वै=जो कोई भी; तत्=उस; परमम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; सः=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=ब्रह्मको न जाननेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=( वह ) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम् तरति=पाप समुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्यः=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्तः=सर्वथा छूटकर; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—यह बिल्कुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमे कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता । वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पाप-समुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है—जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं— तदेतदृचाभ्युक्तम्— क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं एकर्षिं श्रद्दधन्तः । तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥१०॥ तत्=उस ब्रह्मविद्याके विषयमें; एतत्=यह बात, ऋचा अभ्युक्तम्=ऋचाद्वारा कही गयी है; क्रियावन्तः=जो निष्कामभावसे कर्म करनेवाले; श्रोत्रियाः=वेदके अर्थके ज्ञाता ( तथा ); ब्रह्मनिष्ठाः=ब्रह्मके उपासक हैं (और); श्रद्दधन्तः=श्रद्धा रखते हुए, स्वम्=स्वयं, एकर्षिम्='एकर्षि' नामवाले प्रज्वलित अग्निमें; जुह्वते=नियमानुसार हवन करते हैं, तु=तथा; यैः=जिन्होंने; विधिवत्=विधिपूर्वक, शिरोव्रतम्=सर्वश्रेष्ठ व्रतका; चीर्णम्=पालन किया है; तेषाम् एव=उन्हींको; एताम्=यह; ब्रह्मविद्याम्=ब्रह्मविद्या; वदेत=बतलानी चाहिये ॥१०॥ व्याख्या—जिसका इस उपनिषद्में वर्णन हुआ है, उस ब्रह्मविद्याके विषयमें यह बात ऋचाद्वारा कही गयी है कि जो अपने-अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे यथायोग्य कर्म करनेवाले, वेदके यथार्थ अभिप्रायको समझनेवाले, परब्रह्म परमात्मामें श्रद्धा रखनेवाले और उनके जिज्ञासु हैं, जो स्वयं 'एकर्षि' नामसे प्रसिद्ध प्रज्वलित अग्निमें