भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 832 में से

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२८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * शास्त्रविधिके अनुसार हवन करते हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, उन्हींको यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिये ॥ १० ॥ तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥ तत्= उसी; एतत्= इस; सत्यम्= सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा= पहले; अङ्गिराः ऋषिः= अङ्गिरा ऋषिने; उवाच= कहा था, अचीर्णव्रतः= जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है, एतत्= ( वह ) इसे; न= नहीं; अधीते= पढ़ सकता; परमऋषिभ्यः नमः= परम ऋषियोंको नमस्कार है, परमऋषिभ्यः नमः= परम ऋषियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥ व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यको पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता । परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है। इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थ समाप्तिकी सूचना दी गयी है ॥ ११ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ ॥ तृतीय मुण्डक समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाग्ँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।

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