भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 832 में से

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पृष्ठ 315

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ माण्डूक्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्‌में दिया जा चुका है । ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥ ॐ = ॐ; इति = इस प्रकारका, एतत् = यह, अक्षरम् = अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है; इदम् = यह, सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; तस्य = उसका ही; उपव्याख्यानम् = उपव्याख्यान अर्थात् उसीकी निकटतम महिमाका लक्ष्य करानेवाला है; भूतम् = भूत (जो हो चुका); भवत् = वर्तमान (और), भविष्यत् = भविष्यत् (जो होनेवाला है), इति = यह; सर्वम् = सब-का-सब जगत्; ओंकारः = ओंकार; एव = ही है, च = तथा, यत् = जो, त्रिकालातीतम् = ऊपर कहे हुए तीनों कालोंसे अतीत, अन्यत् = दूसरा (कोई तत्त्व है), तत् = वह, अपि = भी, ओंकारः = ओंकार; एव = ही है ॥ १ ॥ व्याख्या—इस उपनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके समग्र रूपका तत्त्व समझानेके लिये उनके चार पादोंकी कल्पना की गयी है । नाम और नामीकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये प्रणवकी अ, उ और म्—इन तीन मात्राओंके साथ और मात्रा- रहित उसके अव्यक्तरूपके साथ परब्रह्म परमात्माके एक-एक पादकी समता दिखलायी गयी है । इस प्रकार इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माका नाम जो ओंकार है, उसको समग्र पुरुषोत्तमसे अभिन्न मानकर यह कहा गया है कि 'ओम्' यह अक्षर ही पूर्णब्रह्म अविनाशी परमात्मा है । यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जड-चेतनका समुदायरूप सम्पूर्ण जगत् उन्हींका उपव्याख्यानी अर्थात् उन्हींकी निकटतम महिमाका निदर्शक है । जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उनमें विलीन हो चुका है और जो इस समय वर्तमान है, तथा जो उनसे उत्पन्न होनेवाला है—वह सब-का-सब ओंकार ही है अर्थात् परब्रह्म परमात्मा ही है । तथा जो तीनों कालोंसे अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है । अर्थात् कारण, सूक्ष्म और स्थूल—इन तीन भेदों- वाला जगत् और इसको धारण करनेवाले परब्रह्मके जिस अंशकी इसके आत्मारूपमें और आधाररूपमें अभिव्यक्ति होती है, उतना ही उन परमात्माका स्वरूप नहीं है; इससे अलग भी वे हैं । अतः उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्माका समग्र रूप है । अभिप्राय यह है कि जो कोई परब्रह्मको केवल साकार मानते हैं या निराकार मानते हैं या सर्वथा निर्विशेष मानते हैं— उन्हें सर्वज्ञता, सर्वाधारता, सर्वकारणता, सर्वेश्वरता, आनन्द, विज्ञान आदि कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न नहीं मानते, वे सब उन परब्रह्मके एक-एक अंशको ही परमात्मा मानते हैं । पूर्णब्रह्म परमात्मा साकार भी हैं, निराकार भी है तथा साकार-निराकार उ० अ० ३७—