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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • मुण्डकोपनिषद् * २८५ सम्बन्ध—पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्‌के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं— नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥ ३॥ अयम् = यह; आत्मा = परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन = न तो प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; एषः = यह; यम् = जिसको; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव = उसके द्वारा ही; लभ्यः = प्राप्त किया जा सकता है; (क्योंकि) एषः = यह; आत्मा = परमात्मा, तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनुम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं; न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धि- के अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं, और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वय स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता । परंतु जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमाया- का परदा हटाकर उसके सामने अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें प्रकट हो जाते हैं* ॥ ३ ॥ नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ॥४॥ अयम् = यह; आत्मा = परमात्मा; बलहीनेन = बलहीन मनुष्यद्वारा, न लभ्यः = नहीं प्राप्त किया जा सकता, च = तथा; प्रमादात् = प्रमादसे; वा = अथवा, अलिङ्गात् = लक्षणरहित; तपसः = तपसे, अपि = भी, न [लभ्यः]=नहीं प्राप्त किया जा सकता; तु = किंतु; यः = जो; विद्वान् = बुद्धिमान् साधक; एतैः = इन; उपायैः = उपायोंके द्वारा; यतते = प्रयत्न करता है; तस्य = उसका, एषः = यह; आत्मा = आत्मा; ब्रह्मधाम = ब्रह्मधाममें, विशते = प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस प्रकरणमें बताये हुए सबके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वर उपासनासूप बलसे रहित मनुष्यद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते । समस्त भोगोंकी आशा छोड़कर एकमात्र परमात्माकी ही उत्कट अभिलाषा रखते हुए निरन्तर विशुद्धभावसे अपने इष्टदेवका चिन्तन करना—यही उपासनारूपी बलका सचय करना है। ऐसे बलसे रहित पुरुषको वे नहीं मिलते । इसी प्रकार कर्तव्यत्यागरूप प्रमादसे भी नहीं मिलते तथा सात्त्विक लक्षणोंसे रहित सयमरूप तपसे भी किसी साधकद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते । किंतु जो बुद्धिमान् साधक इन पूर्वोक्त उपायोंसे प्रयत्न करता है, अर्थात् प्रमादरहित होकर उत्कट अभिलाषाके साथ निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके लक्षण बतलाते हैं—
  • एक आदरणीय महानुभावने इसका यह अर्थ माना है— 'यह आत्मा न तो वेद-शास्त्रके अधिक अध्ययनरूप प्रवचनसे प्राप्त होनेयोग्य है, न ग्रन्थके अर्थको धारण करनेकी शक्ति मेधासे अथवा न अधिक शास्त्र-श्रवणसे ही । यह विद्वान् जिस परमात्माको वरण करता—प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, उस इच्छासे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है । नित्य प्राप्त होनेके कारण अन्य किसी साधनसे वह प्राप्त नहीं हो सकता । यह आत्मा उसके प्रति अपने आत्मस्वरूपको प्रकट कर देता है । जिस प्रकार प्रकाशमें घटादिकी अभिव्यक्ति होती है, उसी प्रकार निष्ठाकी प्राप्ति होनेपर आत्माका आविर्भाव हो जाता है ।

२८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥ वीतरागाः = सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मानः = (और) विशुद्ध अन्त.करणवाले; ऋषयः = ऋषिलोग. एनम् = इस परमात्माको; संप्राप्य = पूर्णतया प्राप्त होकर ज्ञानतृप्ताः = ज्ञानसे तृप्त (एव); प्रशान्ताः = परम शान्त (हो जाते हैं), युक्तात्मानः = अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते = वे; धीराः = ज्ञानीजन सर्वगम् = सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वतः = सब ओरसे प्राप्य = प्राप्त करके, सर्वम् एव = सर्वरूप परमात्मामे ही आविशन्ति = प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या-वे विशुद्ध अन्त करणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारने इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हे किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरने प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामे ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-उस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमे जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्ति- का वर्णन करते हैं- वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥ [ये] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः = जिन्होने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्मा- को पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा) संन्यासयोगात् = कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगमे; शुद्धसत्त्वाः = जिनका अन्त करण शुद्ध हो गया है, ते = वे; सर्वे = समस्त यतयः = प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले = मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु = ब्रह्मलोकमे (जाते हैं और वहाँ) परामृताः = परम अमृतरूप होकर परिमुच्यन्ति = सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या-जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मानक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तकरण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतरूप होकर संसार- बन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है-इस जिज्ञासापर कहते है- गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७॥ पञ्चदश = पंद्रह; कलाः = कलाएँ; च = और; सर्वे = सम्पूर्ण, देवाः = देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु = अपने- अपने अभिमानी देवताओंमें; गताः = जाकर प्रतिष्ठाः = स्थित हो जाते हैं; कर्माणि = (फिर) समस्त कर्म; च = और विज्ञानमयः = विज्ञानमय, आत्मा = जीवात्मा; सर्वे = ये सब के-सब; परे अव्यये = परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति = एक हो जाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या-उस महापुरुषका जब देहपात होता है उस समय पन्द्रह कलाएँ * और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता-

  • पद्रह कलाएँ ये हैं-प्राण, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)

ॐ मुण्डकोपनिषद् ॐ २८७ ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं । उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता । उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं॥७॥ सम्बन्ध—किस प्रकार लीन हो जाते हैं, इस जिज्ञासापर कहते हैं— यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८॥ यथा=जिस प्रकार; स्यन्दमानाः=बहती हुई; नद्यः=नदियाँ; नामरूपे=नाम-रूपको; विहाय=छोड़कर; समुद्रे= समुद्रमें; अस्तम् गच्छन्ति=विलीन हो जाती हैं; तथा=वैसे ही; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; नामरूपात्=नाम-रूपसे; विमुक्तः= रहित होकर; परात् परम्=उत्तम-से-उत्तम; दिव्यम्=दिव्य; पुरुषम्=परमपुरुष परमात्माको; उपैति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥ व्याख्या—जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूपसे रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है—सर्वतोभावसे उन्हींमें विलीन हो जाता है ॥ ८ ॥ स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥ ह=निश्चय ही; यः वै=जो कोई भी; तत्=उस; परमम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; सः=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=ब्रह्मको न जाननेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=( वह ) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम् तरति=पाप समुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्यः=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्तः=सर्वथा छूटकर; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—यह बिल्कुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमे कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता । वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पाप-समुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है—जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं— तदेतदृचाभ्युक्तम्— क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं एकर्षिं श्रद्दधन्तः । तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥१०॥ तत्=उस ब्रह्मविद्याके विषयमें; एतत्=यह बात, ऋचा अभ्युक्तम्=ऋचाद्वारा कही गयी है; क्रियावन्तः=जो निष्कामभावसे कर्म करनेवाले; श्रोत्रियाः=वेदके अर्थके ज्ञाता ( तथा ); ब्रह्मनिष्ठाः=ब्रह्मके उपासक हैं (और); श्रद्दधन्तः=श्रद्धा रखते हुए, स्वम्=स्वयं, एकर्षिम्='एकर्षि' नामवाले प्रज्वलित अग्निमें; जुह्वते=नियमानुसार हवन करते हैं, तु=तथा; यैः=जिन्होंने; विधिवत्=विधिपूर्वक, शिरोव्रतम्=सर्वश्रेष्ठ व्रतका; चीर्णम्=पालन किया है; तेषाम् एव=उन्हींको; एताम्=यह; ब्रह्मविद्याम्=ब्रह्मविद्या; वदेत=बतलानी चाहिये ॥१०॥ व्याख्या—जिसका इस उपनिषद्में वर्णन हुआ है, उस ब्रह्मविद्याके विषयमें यह बात ऋचाद्वारा कही गयी है कि जो अपने-अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे यथायोग्य कर्म करनेवाले, वेदके यथार्थ अभिप्रायको समझनेवाले, परब्रह्म परमात्मामें श्रद्धा रखनेवाले और उनके जिज्ञासु हैं, जो स्वयं 'एकर्षि' नामसे प्रसिद्ध प्रज्वलित अग्निमें

२८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * शास्त्रविधिके अनुसार हवन करते हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, उन्हींको यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिये ॥ १० ॥ तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥ तत्= उसी; एतत्= इस; सत्यम्= सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा= पहले; अङ्गिराः ऋषिः= अङ्गिरा ऋषिने; उवाच= कहा था, अचीर्णव्रतः= जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है, एतत्= ( वह ) इसे; न= नहीं; अधीते= पढ़ सकता; परमऋषिभ्यः नमः= परम ऋषियोंको नमस्कार है, परमऋषिभ्यः नमः= परम ऋषियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥ व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यको पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता । परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है। इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थ समाप्तिकी सूचना दी गयी है ॥ ११ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ ॥ तृतीय मुण्डक समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाग्ँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ माण्डूक्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्‌में दिया जा चुका है । ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥ ॐ = ॐ; इति = इस प्रकारका, एतत् = यह, अक्षरम् = अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है; इदम् = यह, सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; तस्य = उसका ही; उपव्याख्यानम् = उपव्याख्यान अर्थात् उसीकी निकटतम महिमाका लक्ष्य करानेवाला है; भूतम् = भूत (जो हो चुका); भवत् = वर्तमान (और), भविष्यत् = भविष्यत् (जो होनेवाला है), इति = यह; सर्वम् = सब-का-सब जगत्; ओंकारः = ओंकार; एव = ही है, च = तथा, यत् = जो, त्रिकालातीतम् = ऊपर कहे हुए तीनों कालोंसे अतीत, अन्यत् = दूसरा (कोई तत्त्व है), तत् = वह, अपि = भी, ओंकारः = ओंकार; एव = ही है ॥ १ ॥ व्याख्या—इस उपनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके समग्र रूपका तत्त्व समझानेके लिये उनके चार पादोंकी कल्पना की गयी है । नाम और नामीकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये प्रणवकी अ, उ और म्—इन तीन मात्राओंके साथ और मात्रा- रहित उसके अव्यक्तरूपके साथ परब्रह्म परमात्माके एक-एक पादकी समता दिखलायी गयी है । इस प्रकार इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माका नाम जो ओंकार है, उसको समग्र पुरुषोत्तमसे अभिन्न मानकर यह कहा गया है कि 'ओम्' यह अक्षर ही पूर्णब्रह्म अविनाशी परमात्मा है । यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जड-चेतनका समुदायरूप सम्पूर्ण जगत् उन्हींका उपव्याख्यानी अर्थात् उन्हींकी निकटतम महिमाका निदर्शक है । जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उनमें विलीन हो चुका है और जो इस समय वर्तमान है, तथा जो उनसे उत्पन्न होनेवाला है—वह सब-का-सब ओंकार ही है अर्थात् परब्रह्म परमात्मा ही है । तथा जो तीनों कालोंसे अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है । अर्थात् कारण, सूक्ष्म और स्थूल—इन तीन भेदों- वाला जगत् और इसको धारण करनेवाले परब्रह्मके जिस अंशकी इसके आत्मारूपमें और आधाररूपमें अभिव्यक्ति होती है, उतना ही उन परमात्माका स्वरूप नहीं है; इससे अलग भी वे हैं । अतः उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्माका समग्र रूप है । अभिप्राय यह है कि जो कोई परब्रह्मको केवल साकार मानते हैं या निराकार मानते हैं या सर्वथा निर्विशेष मानते हैं— उन्हें सर्वज्ञता, सर्वाधारता, सर्वकारणता, सर्वेश्वरता, आनन्द, विज्ञान आदि कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न नहीं मानते, वे सब उन परब्रह्मके एक-एक अंशको ही परमात्मा मानते हैं । पूर्णब्रह्म परमात्मा साकार भी हैं, निराकार भी है तथा साकार-निराकार उ० अ० ३७—

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  • माण्डूक्योपनिषद् * २९१ स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥ स्वप्नस्थानः = स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगत् ही जिसका स्थान है; अन्तःप्रज्ञः = जिसका ज्ञान सूक्ष्म जगत्‌में व्याप्त है; सप्ताङ्गः = पूर्वोक्त सात अङ्गोंवाला (और); एकोनविंशतिमुखः = उन्नीस मुखोंवाला, प्रविविक्तभुक् = सूक्ष्म जगत्‌का भोक्ता; तैजसः = तैजस—प्रकाशका स्वामी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ; द्वितीयः पादः = उस पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें पूर्णब्रह्म परमात्माके दूसरे पादका वर्णन है । भाव यह है कि जिस प्रकार स्वप्न-अवस्था में सूक्ष्मशरीरका अभिमानी जीवात्मा पहले बतलाये हुए सूक्ष्म सात अङ्गोंवाला और उन्नीस मुखोंवाला होकर सूक्ष्म विषयोंका उपभोग करता है और उसीमे उसका ज्ञान फैला रहता है, उसी प्रकार जो स्थूल अवस्थासे भिन्न सूक्ष्मरूपमें परिणत हुए सात लोकरूप सात अङ्ग तथा इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरणरूप उन्नीस मुखोंसे युक्त सूक्ष्म जगत्रूप शरीरमें स्थित, उसका आत्मा हिरण्यगर्भ है, वह समस्त जड-चेतनात्मक सूक्ष्म जगत्के समस्त तत्त्वोंका नियन्ता, ज्ञाता और सबको अपनेमे प्रविष्ट किये हुए है, इसलिये उसका भोक्ता और जाननेवाला कहा जाता है । वह तैजस अर्थात् सूक्ष्म प्रकाशमय हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है । समस्त ज्योतियोंकी ज्योति, सबको प्रकाशित करनेवाले, परम प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरका ही वर्णन यहाँ तैजस नामसे हुआ है । ब्रह्मसूत्रके 'ज्योतिश्चरणाभिधानात्' ( १ । १ । २४) इस सूत्रमे यह बात स्पष्ट की गयी है कि पुरुषके प्रकरणमे आया हुआ 'ज्योतिः' वा 'तेजः' शब्द ब्रह्मका वाचक ही समझना चाहिये । जहाँ ब्रह्मके पादोंका वर्णन हो, वहाँ तो दूसरा अर्थ—जीव या प्रकाश आदि मानना किसी तरह भी उचित नहीं है । उपनिषदोंमे बहुत जगह परमेश्वरका वर्णन 'ज्योतिः' ( अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते-छा० उ० ३ । १३ । ७) और 'तेजस्' ( येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः तै० ब्रा० ३ । १२ । ९ । ७) के नामसे हुआ है। इसलिये यहाँ केवल 'स्वप्नस्थानः' पदके बलपर स्वप्नावस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका दूसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता । इसमे तीसरे मन्त्रकी व्याख्यामे बताये हुए कारण तो हैं ही । उनके सिवा यह एक कारण और भी है कि स्वप्नावस्थामें जीवात्माका ज्ञान जाग्रत्-अवस्थाकी अपेक्षा कम हो जाता है; किंतु यहाँ जिसका वर्णन तैजसके नामसे किया गया है, उस दूसरे पादरूप हिरण्यगर्भका ज्ञान जाग्रत्‌की अपेक्षा अधिक विकसित होता है । इसीलिये इसको तैजस अर्थात् ज्ञानस्वरूप बतलाया है और दसवें मन्त्रमे ओंकारकी दूसरी मात्रा 'उ'- के साथ इसकी एकता करते हुए इसको उत्कृष्ट ( श्रेष्ठ ) बताया है और इसके जाननेका फल ज्ञान-परम्पराकी वृद्धि और जाननेवालेकी सन्तानका ज्ञानी होना कहा है । स्वप्नाभिमानी जीवात्माके ज्ञानका ऐसा फल नहीं हो सकता, इसलिये भी तैजसका वाच्यार्थ सूक्ष्म जगत्के स्वामी हिरण्यगर्भको ही मानना युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है ॥ ४ ॥ यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥ यत्र = जिस, अवस्थामें; सुप्तः = सोया हुआ ( मनुष्य ); कञ्चन = किसी भी, कामम् न कामयते = भोगकी कामना नहीं करता; कञ्चन = कोई भी, स्वप्नम् = स्वप्न; न = नहीं; पश्यति = देखता; तत् = वह; सुषुप्तम् = सुषुप्ति-अवस्था है; सुषुप्तस्थानः = ऐसी सुषुप्ति अर्थात् जगत्की प्रलय अवस्था, अथवा कारण-अवस्था ही जिसका शरीर है; एकीभूतः = जो एकरूप हो रहा है; प्रज्ञानघनः एव = जो एकमात्र घनीभूत विज्ञानस्वरूप है; आनन्दमयः हि = जो एकमात्र आनन्दमय अर्थात् आनन्दस्वरूप ही है; चेतोमुखः = प्रकाश ही जिसका मुख है; आनन्दभुक् = जो एकमात्र आनन्दका ही भोक्ता है ( वह ); प्राज्ञः = प्राज्ञ, तृतीयः पादः = ( ब्रह्मका ) तीसरा पाद है ॥ ५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे जाग्रत्‌की कारण और लय-अवस्थारूप सुषुप्तिके साथ प्रलयकालमें स्थित कारणरूपसे जगत्की समानता दिखानेके लिये पहले सुप्रसिद्ध सुषुप्ति-अवस्थाके लक्षण बतलाकर उसके बाद पूर्णब्रह्म परमात्माके तीसरे पादका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि जिस अवस्थामें सोया हुआ मनुष्य किसी प्रकारके किसी भी भोगकी न तो कामना करता है और न अनुभव ही करता है तथा किसी प्रकारका स्वप्न भी नहीं देखता, ऐसी अवस्थाको सुषुप्ति कहते हैं। इस सुषुप्ति-अवस्थाके सदृश जो प्रलयकालमें जगत्की कारण-अवस्था है, जिसमें नाना 'रूपों'का प्राकट्य नहीं हुआ है-

२९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ऐसी अव्याकृत प्रकृति ही जिसका शरीर है, तथा जो एक अद्वितीयरूपमें स्थित है, उपनिषदोंमें जिसका वर्णन कहीं सत्‌के नामसे ('सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' छा० उ० ६ । २ । १) और कहीं आत्माके नामसे ('एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते' ) आया है, जिसका एकमात्र चेतना (प्रकाश) ही मुख है और आनन्द ही भोजन है, वह विज्ञानघन, आनन्दमय प्राज्ञ ही उन पूर्णब्रह्मका तीसरा पाद है। यहाँ प्राज्ञ नामसे भी सृष्टिके कारण सर्वज्ञ परमेश्वरका ही वर्णन है। ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्यायके चौथे पादके अन्तर्गत पाँचवें सूत्रमें 'प्राज्ञ' शब्द ईश्वरके अर्थमे प्रयुक्त हुआ है, इसके सिवा और भी बहुत से सूत्रोंमे ईश्वरके स्थानपर 'प्राज्ञ' शब्दका प्रयोग किया गया है। पूज्यपाद स्वामी शङ्कराचार्यने तो ब्रह्मसूत्रके भाष्यमे स्थान-स्थानपर परमेश्वरके बदले 'प्राज्ञ' शब्दका ही प्रयोग किया है। उपनिषदोमे भी अनेक स्थलोंपर 'प्राज्ञ' शब्दका परमेश्वरके स्थानमे प्रयोग किया गया है (बृ० उ० ४ । ३ । २१ और ४ । ३ । ३५) । प्रस्तुत मन्त्रमे साथ-ही-साथ ईश्वरसे भिन्न शरीराभिमानी जीवात्माका भी वर्णन है। यहाँ प्रकरण भी सुषुप्तिका है, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी दृष्टिसे 'प्राज्ञ' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। ब्रह्मसूत्र (१ । ३ । ४२) के भाष्यमें स्वयं शङ्कराचार्यजीने लिखा है कि 'सर्वज्ञतारूप प्रज्ञासे नित्य संयुक्त होनेके कारण 'प्राज्ञ' नाम परमेश्वरका ही है, अतः उपर्युक्त उपनिषद्-मन्त्रमे परमेश्वरका ही वर्णन है।' इसलिये यहाँ केवल 'सुषुप्तस्थान.' पदके बलपर सुषुप्ति-अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका तीसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता, क्योंकि इसके बाद अगले मन्त्रमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इन तीनो अवस्थाओंमें स्थित तीन पादोंके नामसे जिनका वर्णन हुआ है, वे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सम्पूर्ण जगत्‌के कारण और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हे। इसके सिवा ग्यारहवे मन्त्रमे ओंकारकी तीसरी मात्राके साथ तीसरे पादकी एकता करके उसे जाननेका फल सबको जानना और सम्पूर्ण जगत्‌को विलीन कर लेना बताया है, इसलिये भी 'प्राज्ञः' पदका वाच्यार्थ कारण-जगत्‌के अधिष्ठाता परमेश्वरको ही समझना चाहिये। वह प्राज्ञ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका तीसरा पाद है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए ब्रह्मके पाद वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ किसके नाम हैं, इस जिज्ञासापर कहते हैं— एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥ एषः = यह; सर्वेश्वरः = सबका ईश्वर है, एषः = यह; सर्वज्ञः = सर्वज्ञ है; एषः = यह; अन्तर्यामी = सबका अन्तर्यामी है, एषः = यह; सर्वस्य = सम्पूर्ण जगत्‌का; योनिः = कारण है; हि = क्योंकि; भूतानाम् = समस्त प्राणियोंका; प्रभवाप्ययौ = उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरका तीनों पादोके रूपमें वर्णन किया गया है, वे सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। ये ही सर्वज्ञ और सबके अन्तर्यामी हैं। ये ही सम्पूर्ण जगत्‌के कारण हैं, क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान ये ही हैं। प्रश्नोपनिषद्मे तीनो मात्राओंसे युक्त ओंकारके द्वारा परम पुरुष परमेश्वरका ध्यान करनेकी बात कहकर उसका फल समस्त पापोंसे रहित हो अविनाशी परात्पर पुरुषोत्तमको प्राप्त कर लेना बताया गया है (५ । ५) । अतः पूर्ववर्णित वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ परमेश्वरके ही नाम हैं। अलग-अलग स्थितिमें उन्हींका वर्णन भिन्न-भिन्न नामोसे किया गया है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अब पूर्णब्रह्म परमात्माके चौथे पादका वर्णन करते हैं— नान्तःप्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यम- लक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥ न अन्तःप्रज्ञम् = जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है; न बहिष्प्रज्ञम् = न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है; न उभयतःप्रज्ञम् = न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघनम् = न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञम् = न जाननेवाला है; न अप्रज्ञम् = न नहीं जाननेवाला है; अदृष्टम् = जो देखा नहीं गया हो; अव्यवहार्यम् = जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता;

  • माण्डूक्योपनिषद् * २९३ अग्राह्यम् = जो पकड़नेमें नहीं आ सकता; अलक्षणम् = जिसका कोई लक्षण (चिह्न) नहीं है; अचिन्त्यम् = जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता; अव्यपदेश्यम् = जो बतलानेमें नहीं आ सकता; एकात्मप्रत्ययसारम् = एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है; प्रपञ्चोपशमम् = जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा; शान्तम् = सर्वथा शान्त, शिवम् = कल्याणमय, अद्वैतम् = अद्वितीय तत्त्व; चतुर्थम् = (परब्रह्म परमात्माका) चौथा पाद है, मन्यन्ते = (इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं; सः आत्मा = वह परमात्मा (है); सः विज्ञेयः = वह जाननेयोग्य (है) ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपको पूर्णब्रह्म परमात्माका चौथा पाद बताया गया है। भाव यह है कि जिसका ज्ञान न तो बाहरकी ओर है, न भीतरकी ओर है और न दोनों ही ओर है; जो न ज्ञानस्वरूप है, न जाननेवाला है और न नहीं जाननेवाला ही है; जो न देखनेमें आ सकता है, न व्यवहारमें लाया जा सकता है, न ग्रहण करनेमें आ सकता है, न चिन्तन करनेमें, न बतलानेमें आ सकता है और न जिसका कोई लक्षण ही है, जिसमें समस्त प्रपञ्चका अभाव है, एकमात्र परमात्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसमें सार (प्रमाण) है—ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व पूर्णब्रह्मका चौथा पाद माना जाता है। इस प्रकार जिनका चार पादोंमें विभाग करके वर्णन किया गया, वे ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको जानना चाहिये। इस मन्त्रमें 'चतुर्थम् मन्यन्ते' पदके प्रयोगसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ परब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना केवल उनका तत्त्व समझानेके लिये ही की गयी है। वास्तवमें अवयवरहित परमात्माके कोई भाग नहीं हैं। जो पूर्ण- ब्रह्म परमात्मा स्थूल जगत्में परिपूर्ण हैं, वे ही सूक्ष्म और कारण-जगत्के अन्तर्यामी और अधिष्ठाता भी हैं, तथा वे ही इन सबसे अलग निर्विशेष परमात्मा हैं। वे सर्वशक्तिमान् भी हैं और सब शक्तियोंसे रहित भी हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वे साकार भी हैं और निराकार भी। वास्तवमें वे हमारी बुद्धि और तर्कसे सर्वथा अतीत हैं ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—उक्त परब्रह्म परमात्माकी उनके वाचक प्रणवके साथ एकता करते हुए कहते हैं— सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥ सः = वह (जिसको चार पादवाला बताया गया है); अयम् = यह, आत्मा = परमात्मा; अध्यक्षरम् = (उसके वाचक) प्रणवके अधिकारमे (प्रकरणमें) वर्णित होनेके कारण, अधिमात्रम् = तीन मात्राओंसे युक्त; ओंकारः = ओंकार है, अकारः = 'अ'; उकारः = 'उ' (और); मकारः = 'म', इति = ये (तीनों), मात्राः = मात्राएँ ही, पादाः = (तीन) पाद हैं, च = और; पादाः = (उस ब्रह्मके तीन) पाद ही, मात्राः = (तीन) मात्राएँ हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—वे परब्रह्म परमात्मा, जिनके चार पादोंका वर्णन किया गया है, यहाँ अक्षरके प्रकरणमें अपने नामसे अभिन्न होनेके कारण तीन मात्राओंवाला ओंकार हैं। 'अ', 'उ' और 'म'—ये तीनों मात्राएँ ही उनके उपर्युक्त तीन पाद हैं। और उनके तीनों पाद ही ओंकारकी तीन मात्राएँ हैं। जिस प्रकार ओंकार अपनी मात्राओंसे अलग नहीं है, उसी प्रकार अपने पादोंसे परमात्मा अलग नहीं हैं। यहाँ पाद और मात्राकी एकता ओंकारके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी उपासनाके लिये की गयी है—ऐसा मालूम होता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—ओंकारकी किस मात्रासे ब्रह्मके किस पादकी एकता है और वह क्यों है, इस जिज्ञासापर तीन मात्राओंका रहस्य समझानेके लिये प्रथम पहले पाद और पहली मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं— जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥ प्रथमा = (ओंकारकी) पहली, मात्रा = मात्रा, अकारः = अकार ही; आप्तेः = (समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् शब्दमात्रमें) व्याप्त होनेके कारण, वा = और, आदिमत्त्वात् = आदिवाला होनेके कारण; जागरितस्थानः = जाग्रत्की भाँति स्थूल जगत्रूप शरीरवाला, वैश्वानरः = वैश्वानर नामक पहला पाद है, यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद =

२९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जानता है, [ सः ] ह वै = वह अवश्य ही, सर्वान् = सम्पूर्ण, कामान् = भोगोंको; आप्नोति = प्राप्त कर लेता है; च = और, आदिः = सबका आदि (प्रधान), भवति = बन जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो पहली मात्रा 'अ' है, यह समस्त जगत्‌के नामोमे अर्थात् किसी भी अर्थको बतलानेवाले जितने भी शब्द हैं, उन सबमें व्याप्त है। स्वर अथवा व्यञ्जन—कोई भी वर्ण अकारसे रहित नहीं है। श्रुति भी कहती है—'अकारो वै सर्वा वाक्' (ऐतरेय आरण्यक० २।३।६)। गीतामें भी भगवान्‌ने कहा है कि अक्षरोंमें (वर्णोंमे) मैं 'अ' हूँ (१०।३३)। तथा समस्त वर्णोंमे 'अ' ही पहला वर्ण है। इसी प्रकार इस स्थूल जगद्रूप विराट्-शरीरमें वे वैश्वानररूप अन्तर्यामी परमेश्वर व्याप्त हैं और विराट्‌रूपसे सबके पहले स्वयं प्रकट होनेके कारण इस जगत्‌के आदि भी वे ही हैं। इस प्रकार 'अ' की और जाग्रत्‌की भाँति प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले इस स्थूल जगद्रूप शरीरमें व्याप्त वैश्वानर नामक प्रथम पादकी एकता होनेके कारण 'अ' ही पूर्णब्रह्म परमेश्वरका पहला पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार अकार और विराट्‌-शरीरके आत्मा परमेश्वरकी एकताको जानता है और उनकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको अर्थात् इच्छित पदार्थोंको पा लेता है और जगत्‌मे प्रधान—सर्वमान्य हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—अब दूसरे पादकी और दूसरी मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं— स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥ द्वितीया = (ओंकारकी) दूसरी, मात्रा = मात्रा; उकारः = 'उ', उत्कर्षात् = ('अ' से) उत्कृष्ट होनेके कारण; वा = और; उभयत्वात् = दोनों भाववाला होनेके कारण, स्वप्नस्थानः = स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगद्रूप शरीरवाला; तैजसः = तैजस नामक (दूसरा पाद) है; यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है, [सः] ह वै = वह अवश्य ही; ज्ञान- संततिम् = ज्ञानकी परम्पराको; उत्कर्षति = उन्नत करता है; च = और; समानः = समान भाववाला; भवति = हो जाता है; अस्य = इसके, कुले = कुलमें; अब्रह्मवित् = वेदरूप ब्रह्मको न जाननेवाला; न = नहीं; भवति = होता ॥ १० ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारकी दूसरी मात्रा जो 'उ' है, यह 'अ' से उत्कृष्ट (ऊपर उठा हुआ) होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा 'अ' और 'म' इन दोनोंके बीचमें होनेके कारण उन दोनोंके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः यह उभयस्वरूप है। इसी प्रकार वैश्वानरसे तैजस (हिरण्यगर्भ) उत्कृष्ट है तथा वैश्वानर और प्राज्ञके मध्यगत होनेसे वह उभयसम्बन्धी भी है। इस समानताके कारण ही 'उ' को 'तैजस' नामक द्वितीय पाद कहा गया है। भाव यह है कि इस स्थूल जगत्‌के प्राकट्यसे पहले परमेश्वरके आदि सङ्कल्पद्वारा जो सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसका वर्णन मानस सृष्टिके नामसे आता है, जिसमे समस्त तत्त्व तन्मात्राओंके रूपमें रहते हैं, स्थूलरूपमें परिणत नहीं होते, उस सूक्ष्म जगद्रूप शरीरमे चेतन प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ परमेश्वर इसके अधिष्ठाता होकर रहते हैं। तथा कारण-जगत् और स्थूल-जगत्— इन दोनोंसे ही सूक्ष्म जगत्‌का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये वे कारण और स्थूल दोनों रूपवाले हैं। इस तरह 'उ' की और मानसिक सृष्टिके अधिष्ठाता तैजसरूप दूसरे पादकी समानता होनेके कारण 'उ' ही पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'उ' और तेजोमय हिरण्यगर्भ-स्वरूपकी एकताके रहस्यको समझ लेता है, वह स्वयं इस जगत्‌के सूक्ष्म तत्त्वोंको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण इस ज्ञानकी परम्पराको उन्नत करता है—उसे बढाता है तथा सर्वत्र समभाववाला हो जाता है, क्योंकि जगत्‌के सूक्ष्म तत्त्वोंको समझ लेनेके कारण उसका वास्तविक रहस्य समझमे आ जानेसे उसकी विषमताका नाश हो जाता है। इसलिये उससे उत्पन्न हुई सन्तान भी कोई ऐसी नहीं होती, जिसको हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरके उपर्युक्त रहस्यका ज्ञान न हो जाय ॥ १० ॥ सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥

तृतीया = ( ओंकारकी ) तीसरी; मात्रा = मात्रा; मकारः = 'म' ही; मितेः = माप करनेवाला (जाननेवाला) होनेके कारण; वा = और; अपीतेः = विलीन करनेवाला होनेसे; सुषुप्तस्थानः = सुषुप्तिकी भाँति कारणमें विलीन जगत् ही जिसका शरीर है; प्राज्ञः = प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है; [ सः ] ह वै = वह अवश्य ही; इदम् = इस; सर्वम् = सम्पूर्ण कारण-जगत्को; मिनोति = माप लेता है अर्थात् भलीभाँति जान लेता है; च = और; अपीतिः = सबको अपनेमें विलीन करनेवाला; भवति = हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो तीसरी मात्रा 'म' है, यह 'मा' धातुसे बना है। 'मा' धातुका अर्थ माप लेना यानी अमुक वस्तु इतनी है, यह समझ लेना है। यह 'म' ओंकारकी अन्तिम मात्रा है; 'अ' और 'उ' के पीछे उच्चरित होती है—इस कारण दोनोंका माप इसमें आ जाता है; अतः यह उनको जाननेवाला है। तथा 'म' का उच्चारण होते-होते मुख बंद हो जाता है, 'अ' और 'उ' दोनों उसमें विलीन हो जाते हैं; अतः वह उन दोनों मात्राओंको अन्तमें विलीन करनेवाला भी है। इसी प्रकार सुषुप्तस्थानीय कारण-जगत्का अधिष्ठाता प्राज्ञ भी सर्वज्ञ है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित जगत्‌को जाननेवाला है। कारण-जगत्‌से ही सूक्ष्म और स्थूल जगत्‌की उत्पत्ति होती है और उसीमें उनका लय भी होता है। इस प्रकार 'म' की और कारण-जगत्‌के अधिष्ठाता प्राज्ञ नामक तीसरे पादकी समता होनेके कारण 'म' रूप तीसरी मात्रा ही पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'म' और 'प्राज्ञ' स्वरूप परमेश्वरकी एकताको जानता है—इस रहस्यको समझकर ओंकारके स्मरणद्वारा परमेश्वरका चिन्तन करता है, वह इस मूलसहित सम्पूर्ण जगत्‌को भली प्रकार जान लेता है और सबको विलीन करनेवाला हो जाता है, अर्थात् उसकी बाह्य दृष्टि निवृत्त हो जाती है। अतः वह सर्वत्र एक परब्रह्म परमेश्वरको ही देखनेवाला बन जाता है ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—मात्रारहित ओंकारकी चौथे पादके साथ एकताका प्रतिपादन करते हुए इस उपनिषद्‌का उपसंहार करते हैं— अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥ १२ ॥ एवम् = इसी प्रकार; अमात्रः = मात्रारहित; ओंकारः = प्रणव ही; अव्यवहार्यः = व्यवहारमें न आनेवाला, प्रपञ्चोपशमः = प्रपञ्चसे अतीत, शिवः = कल्याणमय; अद्वैतः = अद्वितीय; चतुर्थः = पूर्ण ब्रह्मका चौथा पाद है; [ सः ] आत्मा = वह आत्मा; एव = अवश्य ही, आत्मना = आत्माके द्वारा, आत्मानम् = परात्पर ब्रह्म परमात्मामें; संविशति = पूर्णतया प्रविष्ट हो जाता है, यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है, यः एवम् वेद = जो इस प्रकार जानता है ॥ १२ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारका जो मात्रारहित, बोलनेमें न आनेवाला, निराकार स्वरूप है, वही मन-वाणीका अविषय होनेसे व्यवहारमें न लाया जा सकनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय, अद्वितीय—निर्गुण-निराकाररूप चौथा पाद है। भाव यह है कि जिस प्रकार तीन मात्राओंकी पहले बताये हुए तीन पादोंके साथ समता है, उसी प्रकार ओंकारके निराकार स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके निर्गुण-निराकार निर्विशेषरूप चौथे पादके साथ समता है। जो मनुष्य इस प्रकार ओंकार और परब्रह्म परमात्माकी अर्थात् नाम और नामीकी एकताके रहस्यको समझकर परब्रह्म परमात्माको पानेके लिये उनके नाम-जपका अवलम्ब लेकर तत्परतासे साधन करता है, वह निस्सन्देह आत्मासे आत्मामें अर्थात् परात्पर परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है। 'जो इस प्रकार जानता है' इस वाक्यको दो बार कहकर उपनिषद्‌की समाप्ति सूचित की गयी है। परब्रह्म परमात्मा और उनके नामकी महिमा अपार है, उसका कोई पार नहीं पा सकता। इस प्रकरणमें उन असीम पूर्णब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना उनके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों सगुण रूपोंकी और निर्गुण-निराकार स्वरूपकी एकता दिखानेके लिये तथा नाम और नामीकी सब प्रकारसे एकता दिखानेके लिये एव उनकी सर्वभवन-

२९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति_ सामर्थ्यरूप जो अचिन्त्य शक्ति है, वह उनसे सर्वथा अभिन्न है—यह भाव दिखानेके लिये की गयी है, ऐसा अनुमान होता है ॥ १२ ॥ ॥ अथर्ववेदीय माण्डूक्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्मे दिया जा चुका है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऐतरेयोपनिषद् ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय-उपनिषद्के नामसे कहा गया है । इन तीन अध्यायोंमे ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है, इस कारण इन्हींको 'उपनिषद्' माना है । शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॐ=हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्, मे=मेरी; वाक्=वाक्-इन्द्रिय, मनसि=मनमें, प्रतिष्ठिता=स्थित हो जाय; मे=मेरा; मनः= मन, वाचि=वाक्-इन्द्रियमें; प्रतिष्ठितम्= स्थित हो जाय, आविः= हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर; मे=मेरे लिये; आवीः एधि= (तू ) प्रकट हो, मे= ( हे मन और वाणी ! तुम दोनों ) मेरे लिये, वेदस्य=वेदविषयक ज्ञानको, आणिस्थः= लानेवाले बनो; मे=मेरा; श्रुतम्= सुना हुआ ज्ञान; मा प्रहासीः= ( मुझे ) न छोड़े; अनेन अधीतेन=इस अध्ययनके द्वारा; अहोरात्रान्= ( मैं ) दिन और रात्रियोंको, संदधामि=एक कर दूँ, ऋतम्= ( मै ) श्रेष्ठ शब्दोंको ही , वदिष्यामि=बोलूँगा, सत्यम्=सत्य ही; वदिष्यामि=बोला करूँगा, तत्=वह (ब्रह्म); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत् =वह ( ब्रह्म ), वक्तारम् अवतु=आचार्यकी रक्षा करे, अवतु माम्=रक्षा करे मेरी ( और ), अवतु वक्तारम्= रक्षा करे ( मेरे ) आचार्यकी, अवतु वक्तारम्=रक्षा करे ( मेरे ) आचार्यकी; ओम् शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप है । व्याख्या—इस शान्तिपाठमे सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है । प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन् ! मेरी वाणी मनमे स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय, अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायें । ऐसा न हो कि मै वाणीसे एक पाठ पढता रहूँ और मन दूसरा ही चिन्तन करता रहे, या मनमे दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ । मेरे सङ्कल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायें । हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये—अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये । (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक अपने मन और वाणीसे कहता है कि ) हे मन और वाणी ! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो—तुम्हारी सहायतासे में वेदविषयक ज्ञान प्राप्त कर सकूँ । मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमे आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मै उसे कभी न भूलूँ । मेरी इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूँ । अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ । मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते । मै अपनी वाणीसे सदा ऐसे ही शब्दोका उच्चारण करूँगा, जो सर्वथा उत्तम हो, जिनमे किसी प्रकारका दोष न हो, तथा जो कुछ बोलूँगा, सर्वथा सत्य बोलूँगा—जैसा देखा, सुना और समझा हुआ भाव है, ठीक वही भाव वाणीद्वारा प्रकट करूँगा । उसमे किसी प्रकारका छल नहीं करूँगा । ( इस प्रकार अपने मन और वाणीको दृढ बनाकर अब पुनः परमात्मासे प्रार्थना करता है—) वे परब्रह्म परमात्मा मेरी रक्षा करें । वे परमेश्वर मुझे ब्रह्मविद्या सिखाने- वाले आचार्यकी रक्षा करें । वे रक्षा करें मेरी और मेरे आचार्यकी, जिससे मेरे अध्ययनमे किसी प्रकारका विघ्न उपस्थित न उ० अं० ३८—

प्रथम अध्याय

२९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * हो। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंकी सर्वथा निवृत्तिके लिये तीन वार 'शान्तिः' पद- का उच्चारण किया गया है। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, इसलिये उनके स्मरणसे शान्ति निश्चित है। प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥१॥ ॐ = ॐ; इदम् = यह जगत्, अग्रे = (प्रकट होनेसे) पहले, एकः = एकमात्र, आत्मा = परमात्मा, वै = ही; आसीत् = था; अन्यत् = (उसके सिवा) दूसरा, किंचन = कोई, एव = भी, मिषत् = चेष्टा करनेवाला; न = नहीं था; सः = उस (परम पुरुष परमात्मा) ने. नु = (मैं) निश्चय ही लोकान् सृजै = लोकोंकी रचना करूँ, इति = इस प्रकार; ईक्षत = विचार किया ॥१॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टिरचना-विषयक प्रथम सङ्कल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी। उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने यह विचार किया कि 'मैं प्राणियोंके कर्म-फल भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥ स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥ सः = उसने, अम्भः = अम्भ (द्युलोक तथा उसके ऊपरके लोक), मरीचीः = मरीचि (अन्तरिक्ष); मरम् = मर (मर्त्यलोक) और आपः = जल (पृथ्वीके नीचेके लोक) इमान् = इन सब; लोकान् असृजत = लोकोंकी रचना की, दिवम् परेण = द्युलोक-स्वर्गलोकसे ऊपरके लोक प्रतिष्ठा = (तथा) उनका आधारभूत, द्यौः = द्युलोक भी; अदः = वे सब, अम्भः = 'अम्भ' के नामसे कहे गये है, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष लोक (भुवर्लोक) ही मरीचयः = मरीचि है (तथा); पृथिवी = यह पृथ्वी ही, मरः = मर-मृत्युलोकके नामसे कही गयी है (और); याः = जो, अधस्तात् = (पृथ्वीके) नीचे-भीतरी भागमे (स्थूल पातालादि लोक) है, ताः = वे आपः = जलके नामसे कहे गये हैं ॥ २ ॥ व्याख्या-यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अम्भ, मरीचि, मर और जल-इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है कि स्वर्गलोकमे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्य लोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक-इन पाँचों लोकोंको यहाँ 'अम्भ' नामसे कहा गया है। उसके नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमे सूर्य, चन्द्र और तारागण-ये सब गिरनेवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है। उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है-जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ 'मर' के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि लोक हैं, वे 'आपः' के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्मे जितने भी लोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एव सप्त लोकोंके नामसे प्रसिद्ध है, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की ॥ २ ॥ स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥ सः = उसने, ईक्षत = फिर विचार किया; इमे = ये, नु = तो हुए; लोकाः = लोक, (अत्र) लोकपालान् नु सृजै = लोकपालोंकी भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये, इति = यह विचार करके, सः = उसने; अद्भ्यः = जलसे, एव = ही, पुरुषम् = हिरण्यगर्भरूप पुरुषको, समुद्धृत्य = निकालकर, अमूर्छयत् = उसे मूर्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥ व्याख्या-इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि 'ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी रक्षा करनेवाले लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये, अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे।' यह सोचकर उन्होंने जलमेसे अर्थात् जल आदि सूक्ष्म 'महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय

  • ऐतरेयोपनिषद् * २९९ पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया । यहाँ 'पुरुष' शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है—यह विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे—कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है । अतः यहाँ 'पुरुष' शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है ॥ ३ ॥ तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षीभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥४ ॥ (परमात्माने) तम् = उस (हिरण्यगर्भरूप पुरुष) को लक्ष्य करके; अभ्यतपत् = संकल्परूप तप किया; अभितप्तस्य = उस तपसे तपे हुए; तस्य = हिरण्यगर्भके शरीरसे; यथाण्डम् = (पहले) अण्डेकी तरह (फूटकर); मुखम् = मुख-छिद्र; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; मुखात् = मुखसे; वाक् = वाक्-इन्द्रिय (और); वाचः = वाक् इन्द्रियसे; अग्निः = अग्निदेवता प्रकट हुआ (फिर), नासिके = नासिकाके दोनों छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; नासिकाभ्याम् = नासिका-छिद्रोंमेंसे, प्राणः = प्राण उत्पन्न हुआ (और); प्राणात् = प्राणसे, वायुः = वायुदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); अक्षिणी = दोनों आँखोंके छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; अक्षिभ्याम् = आँखोंके छिद्रोंमेंसे; चक्षुः = नेत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); चक्षुषः = नेत्र-इन्द्रियसे, आदित्यः = सूर्य प्रकट हुआ; (फिर) कर्णौ = दोनों कानोंके छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; कर्णाभ्याम् = कानोंसे; श्रोत्रम् = श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); श्रोत्रात् = श्रोत्र-इन्द्रियसे; दिशः = दिशाएँ प्रकट हुईं (फिर); त्वक् = त्वचा; निरभिद्यत = प्रकट हुई, त्वचः = त्वचासे; लोमानि = रोम उत्पन्न हुए (और); लोमभ्यः = रोमोंसे; ओषधिवनस्पतयः = ओषधि और वनस्पतियाँ प्रकट हुईं (फिर), हृदयम् = हृदय; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; हृदयात् = हृदयसे, मनः = मनका आविर्भाव हुआ (और); मनसः = मनसे, चन्द्रमाः = चन्द्रमा उत्पन्न हुआ (फिर); नाभिः = नाभि, निरभिद्यत = प्रकट हुई; नाभ्याः = नाभिसे, अपानः = अपानवायु प्रकट हुआ (और); अपानात् = अपानवायुसे, मृत्युः = मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); शिश्नम् = लिङ्ग; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; 'शिश्नात् = लिङ्गसे, रेतः = वीर्य (और); रेतसः = वीर्यसे, आपः = जल उत्पन्न हुआ ॥ ४ ॥ —इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग-उपाङ्गोंको व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फटकर मुख-छिद्र निकला । मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक्-इन्द्रियसे उसका अधिष्ठातृ-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ । फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ । यहाँ घ्राणेन्द्रियका अलग वर्णन नहीं है, अतः घ्राण- इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए—यों समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—यह समझ लेना चाहिये । फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ । फिर कानोंके दोनों छिद्र निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुईं; उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए और रोमोंसे ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं । फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ । फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ । नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिये । यहाँ अपानवायु मल-त्यागमे हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है । परन्तु मृत्यु अपानका अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका

३०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अधिष्ठाता है, अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है । फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ । यहाँ लिङ्गसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ— यह बात भी समझ लेनी चाहिये ॥ ४ ॥ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्ना- यतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ ताः=वे, एताः सृष्टाः= परमात्माद्वारा रचे हुए ये सब, देवताः=अग्नि आदि देवता, अस्मिन् = इस (संसाररूप), महति = महान्; अर्णवे = समुद्रमें; प्रापतन् = आ पड़े, (तब परमात्माने) तम् = उस (समस्त देवताओंके समुदाय) को; अशनायापिपासाभ्याम् = भूख और प्याससे, अन्ववार्जत् =युक्त कर दिया, (तब) ताः =वे सब अग्नि आदि देवता; एनम् अब्रुवन् =इस परमात्मासे बोले, (भगवन्) नः=हमारे लिये; आयतनम् प्रजानीहि = एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये; यस्मिन्=जिसमें; प्रतिष्ठिताः= स्थित रहकर; [वयम् = हमलोग;] अन्नम् = अन्न; अदाम इति = भक्षण करें ॥ १ ॥ व्याख्या—परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमे आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला, जिससे वे उस समष्टि-शरीरमे ही रहे । तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे सयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले—'भगवन् ! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें—अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें' ॥ १ ॥ ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥२॥ ताभ्यः = (परमात्मा) उन देवताओंके लिये; गाम् = गौका शरीर; आनयत् = लाये, (उसे देखकर) ताः = उन्होंने; अब्रुवन् = कहा; नः = हमारे लिये; अयम् = यह; अलम् = पर्याप्त; न वै= नहीं है; इति = इस प्रकार उनके कहनेपर (परमात्मा), ताभ्यः = उनके लिये; अश्वम् = घोड़ेका शरीर, आनयत् = लाये, (उसे देखकर भी) ताः = उन्होंने (फिर वैसे ही); अब्रुवन् = कहा कि, अयम् = यह भी; नः = हमारे लिये; अलम् = पर्याप्त, न वै इति = नहीं हे ॥ २ ॥ व्याख्या—इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्त्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया । उसे देखकर उन्होंने कहा—'भगवन् ! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका । इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये ।' तब परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया । उसे देखकर वे फिर बोले—'भगवन् ! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा काम नहीं चल सकता । आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये' ॥ २ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥ ताभ्यः= (तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम् = मनुष्यका शरीर; आनयत् = लाये; (उसे देखकर) ताः= वे (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले, बत=बस, सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही, पुरुषः =मनुष्य शरीर, सुकृतम् = (परमात्माकी) सुन्दर रचना है, ता. अब्रवीत् = (फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम् = अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें, प्रविशत इति = प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०१ व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया । उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया । इसमे हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।' सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है, इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है, क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है । जब सब देवताओंगने उस शरीरको पसन्द किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमे प्रवेश कर जाओ ॥ ३ ॥ अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्रा- विशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभि प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ अग्निः = (तब) अग्निदेवता, वाक् = वाक्-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, मुखम् प्राविशत् = मुखमे प्रविष्ट हो गया, वायुः = वायुदेवता, प्राणः = प्राण, भूत्वा = बनकर, नासिके प्राविशत् = नासिकाके छिद्रोमे प्रविष्ट हो गया, आदित्यः = सूर्यदेवता, चक्षुः = नेत्र-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, अक्षिणी प्राविशत् = आँखोंके गोलकोंमें प्रविष्ट हो गया, दिशः = दिशाओंके अभिमानी देवता, श्रोत्रम् = श्रोत्र-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, कर्णौ प्राविशन् = कानोंमें प्रविष्ट हो गये, ओषधिवनस्पतयः = ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता, लोमानि = रोएँ, भूत्वा = बनकर, त्वचम् प्राविशन् = त्वचा मे प्रविष्ट हो गये, चन्द्रमाः = चन्द्रमा, मनः = मन, भूत्वा = बनकर, हृदयम् प्राविशत् = हृदयमे प्रविष्ट हो गया, मृत्युः = मृत्युदेवता, अपानः = अपानवायु, भूत्वा = बनकर, नाभिम् प्राविशत् = नाभिमें प्रविष्ट हो गया, आपः = जलका अभिमानी देवता, रेतः = वीर्य, भूत्वा = बनकर, शिश्नम् प्राविशन् = लिङ्गमे प्रविष्ट हो गया ॥ ४ ॥ व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट हो गये । उन्होंने जिह्वाको अपना आश्रय बना लिया । यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमे प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये । फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके छिद्रोंमे (उसी मार्गसे समस्त शरीरमे) प्रविष्ट हो गये । अश्विनीकुमार भी घ्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामे प्रविष्ट हो गये—यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है, क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है । उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर आँखोंमे प्रविष्ट हो गये । दिगभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये । ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमे प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा मनका रूप धारण करके हृदयमे प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभिमे प्रविष्ट हो गये । जलके अधिष्ठातृ देवता वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार सब-के-सब देवता इन्द्रियोके रूपमे अपने-अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये ॥ ४ ॥ तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति । ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥५॥ तम् = उस परमात्मासे, अशनायापिपासे = भूख और प्यास—ये दोनों, अब्रूताम् = बोलीं; आवाभ्याम् = हमारे लिये भी; अभिप Build= (स्थानकी) व्यवस्था कीजिये, इति = यह (सुनकर), ते = उनसे, अब्रवीत् = (परमात्माने) कहा, वाम् = तुम दोनोंको (मै), एतासु = इन सब, देवतासु = देवताओंमें, एव = ही, आभजामि = भाग दिये देता हूँ, एतासु = इन (देवताओ) में ही (तुम्हें), भागिन्यौ = भागीदार, करोमि इति = बनाता हूँ, तस्मात् = इसलिये यस्यै कस्यै च = जिस किसी भी, देवतायै = देवताके लिये, हविः = हवि (भिन्न-भिन्न विषय), गृह्यते = (इन्द्रियोंद्वारा)

३०२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ग्रहण की जाती है; अस्याम् = उस देवता ( के भोजन ) मे; अशनायापिपासे = भूख और प्यास--दोनों, एव = ही; भागिन्यौ = भागीदार; भवतः = होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या-तत्र भूख और प्यास-ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं-'भगवन् ! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमे हमे स्थापित कीजिये ।' उनके यो कहनेपर उनसे सृष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा- 'तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है । तुम दोनोंको म इन देवताओंके ही स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोको भागीदार बना देता हूँ।' सृष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था, इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमे ये क्षुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ क्षुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने, ईक्षत = फिर विचार किया; नु = निश्चय ही; इमे = ये सब; लोकाः = लोक; च = और; लोकपालाः = लोकपाल, च = भी; ( रचे गये, अब ) एभ्यः = इनके लिये; अन्नम् सृजै इति = मुझे अन्नकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥ व्याख्या-इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया-'ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये-इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अन्न भी होना चाहिये-भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उसकी (अन्नकी) भी रचना करूँ' ॥ १ ॥ सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने; अपः = जलोंको ( पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको ); अभ्यतपत् = तपाया ( सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की ), ताभ्यः अभितप्ताभ्यः = उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे, मूर्तिः = मूर्ति, अजायत = उत्पन्न हुई; वै = निश्चय ही, या = जो, सा = वह; मूर्तिः = मूर्ति; अजायत = उत्पन्न हुई, तत् वै = वही, अन्नम् = अन्न है ॥ २ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलोंको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया-अपने सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके सङ्कल्पद्वारा सचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ, वही अन्न-देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥ तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्या- हृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ सृष्टम् = उत्पन्न किया हुआ, तत् = वह, एनत् = यह अन्न, पराङ् = ( भोक्ता पुरुषसे ) विमुख होकर, अत्यजिघांसत् = भागनेकी चेष्टा करने लगा, तत् = ( तब उस पुरुषने ) उसको, वाचा = वाणीद्वारा; अजिघृक्षत् = ग्रहण करनेकी इच्छा की; ( परंतु वह ) तत् = उसको, वाचा = वाणीद्वारा, ग्रहीतुम् न अशक्नोत् = ग्रहण नहीं कर सका, यत् = यदि, सः = वह, एनत् = इस अन्नको, वाचा = वाणीद्वारा; ह = ही, अग्रहैष्यत् = ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य ) ह = अवश्य ही, अन्नम् अभिव्याहृत्य = अन्नका वर्णन करके, एव = ही; अत्रप्स्यत् = तृप्त । जाता ॥ ३ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०३ व्याख्या—लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है; उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता, परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥ तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥४॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियके द्वारा,* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=घ्राणेन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य, अन्नम्=अन्नको; अभिप्राण्य=सूँघकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् घ्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको घ्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको घ्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्= उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥६॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा ह=ही अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्सन्देह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥७॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको;
  • घ्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा घ्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ घ्राणेन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेमे पूर्वापरविरोध आयेगा।

३०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; त्वचा=चमड़ी- द्वारा, ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो, ह=अवश्य ही (अब भी मनुष्य); अन्नम्=अन्नको; स्पृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥८॥ ( तब उस पुरुषने ) तत्=उसको, मनसा=मनसे, अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा= मनसे भी, ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो, ह=अवश्य ही, (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको, ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥९॥ (फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा, (परंतु) तत्=उसको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह; एनत्= इसको, शिश्नेन=उपस्थद्वारा, ह=ही, अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विसृज्य= अन्नका त्याग करके, एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी, मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥ तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैपोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ (अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको, अपानेन=अपानवायुके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा; ( इस वार उसने) तत्=उसको, आवयत्=ग्रहण कर लिया, सः=वह, एषः=यह अपानवायु ही, अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है, यत्=जो, वायुः=वायु, अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें, वै=प्रसिद्ध है; यत्= जो; एषः=यह, वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥ व्याख्या—अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाहा, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की, तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राण-वायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥१०॥ स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचामि- व्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥