कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- माण्डूक्योपनिषद् * २९१ स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥ स्वप्नस्थानः = स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगत् ही जिसका स्थान है; अन्तःप्रज्ञः = जिसका ज्ञान सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है; सप्ताङ्गः = पूर्वोक्त सात अङ्गोंवाला (और); एकोनविंशतिमुखः = उन्नीस मुखोंवाला, प्रविविक्तभुक् = सूक्ष्म जगत्का भोक्ता; तैजसः = तैजस—प्रकाशका स्वामी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ; द्वितीयः पादः = उस पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें पूर्णब्रह्म परमात्माके दूसरे पादका वर्णन है । भाव यह है कि जिस प्रकार स्वप्न-अवस्था में सूक्ष्मशरीरका अभिमानी जीवात्मा पहले बतलाये हुए सूक्ष्म सात अङ्गोंवाला और उन्नीस मुखोंवाला होकर सूक्ष्म विषयोंका उपभोग करता है और उसीमे उसका ज्ञान फैला रहता है, उसी प्रकार जो स्थूल अवस्थासे भिन्न सूक्ष्मरूपमें परिणत हुए सात लोकरूप सात अङ्ग तथा इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरणरूप उन्नीस मुखोंसे युक्त सूक्ष्म जगत्रूप शरीरमें स्थित, उसका आत्मा हिरण्यगर्भ है, वह समस्त जड-चेतनात्मक सूक्ष्म जगत्के समस्त तत्त्वोंका नियन्ता, ज्ञाता और सबको अपनेमे प्रविष्ट किये हुए है, इसलिये उसका भोक्ता और जाननेवाला कहा जाता है । वह तैजस अर्थात् सूक्ष्म प्रकाशमय हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है । समस्त ज्योतियोंकी ज्योति, सबको प्रकाशित करनेवाले, परम प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरका ही वर्णन यहाँ तैजस नामसे हुआ है । ब्रह्मसूत्रके 'ज्योतिश्चरणाभिधानात्' ( १ । १ । २४) इस सूत्रमे यह बात स्पष्ट की गयी है कि पुरुषके प्रकरणमे आया हुआ 'ज्योतिः' वा 'तेजः' शब्द ब्रह्मका वाचक ही समझना चाहिये । जहाँ ब्रह्मके पादोंका वर्णन हो, वहाँ तो दूसरा अर्थ—जीव या प्रकाश आदि मानना किसी तरह भी उचित नहीं है । उपनिषदोंमे बहुत जगह परमेश्वरका वर्णन 'ज्योतिः' ( अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते-छा० उ० ३ । १३ । ७) और 'तेजस्' ( येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः तै० ब्रा० ३ । १२ । ९ । ७) के नामसे हुआ है। इसलिये यहाँ केवल 'स्वप्नस्थानः' पदके बलपर स्वप्नावस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका दूसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता । इसमे तीसरे मन्त्रकी व्याख्यामे बताये हुए कारण तो हैं ही । उनके सिवा यह एक कारण और भी है कि स्वप्नावस्थामें जीवात्माका ज्ञान जाग्रत्-अवस्थाकी अपेक्षा कम हो जाता है; किंतु यहाँ जिसका वर्णन तैजसके नामसे किया गया है, उस दूसरे पादरूप हिरण्यगर्भका ज्ञान जाग्रत्की अपेक्षा अधिक विकसित होता है । इसीलिये इसको तैजस अर्थात् ज्ञानस्वरूप बतलाया है और दसवें मन्त्रमे ओंकारकी दूसरी मात्रा 'उ'- के साथ इसकी एकता करते हुए इसको उत्कृष्ट ( श्रेष्ठ ) बताया है और इसके जाननेका फल ज्ञान-परम्पराकी वृद्धि और जाननेवालेकी सन्तानका ज्ञानी होना कहा है । स्वप्नाभिमानी जीवात्माके ज्ञानका ऐसा फल नहीं हो सकता, इसलिये भी तैजसका वाच्यार्थ सूक्ष्म जगत्के स्वामी हिरण्यगर्भको ही मानना युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है ॥ ४ ॥ यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥ यत्र = जिस, अवस्थामें; सुप्तः = सोया हुआ ( मनुष्य ); कञ्चन = किसी भी, कामम् न कामयते = भोगकी कामना नहीं करता; कञ्चन = कोई भी, स्वप्नम् = स्वप्न; न = नहीं; पश्यति = देखता; तत् = वह; सुषुप्तम् = सुषुप्ति-अवस्था है; सुषुप्तस्थानः = ऐसी सुषुप्ति अर्थात् जगत्की प्रलय अवस्था, अथवा कारण-अवस्था ही जिसका शरीर है; एकीभूतः = जो एकरूप हो रहा है; प्रज्ञानघनः एव = जो एकमात्र घनीभूत विज्ञानस्वरूप है; आनन्दमयः हि = जो एकमात्र आनन्दमय अर्थात् आनन्दस्वरूप ही है; चेतोमुखः = प्रकाश ही जिसका मुख है; आनन्दभुक् = जो एकमात्र आनन्दका ही भोक्ता है ( वह ); प्राज्ञः = प्राज्ञ, तृतीयः पादः = ( ब्रह्मका ) तीसरा पाद है ॥ ५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे जाग्रत्की कारण और लय-अवस्थारूप सुषुप्तिके साथ प्रलयकालमें स्थित कारणरूपसे जगत्की समानता दिखानेके लिये पहले सुप्रसिद्ध सुषुप्ति-अवस्थाके लक्षण बतलाकर उसके बाद पूर्णब्रह्म परमात्माके तीसरे पादका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि जिस अवस्थामें सोया हुआ मनुष्य किसी प्रकारके किसी भी भोगकी न तो कामना करता है और न अनुभव ही करता है तथा किसी प्रकारका स्वप्न भी नहीं देखता, ऐसी अवस्थाको सुषुप्ति कहते हैं। इस सुषुप्ति-अवस्थाके सदृश जो प्रलयकालमें जगत्की कारण-अवस्था है, जिसमें नाना 'रूपों'का प्राकट्य नहीं हुआ है-