कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ऐसी अव्याकृत प्रकृति ही जिसका शरीर है, तथा जो एक अद्वितीयरूपमें स्थित है, उपनिषदोंमें जिसका वर्णन कहीं सत्के नामसे ('सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' छा० उ० ६ । २ । १) और कहीं आत्माके नामसे ('एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते' ) आया है, जिसका एकमात्र चेतना (प्रकाश) ही मुख है और आनन्द ही भोजन है, वह विज्ञानघन, आनन्दमय प्राज्ञ ही उन पूर्णब्रह्मका तीसरा पाद है। यहाँ प्राज्ञ नामसे भी सृष्टिके कारण सर्वज्ञ परमेश्वरका ही वर्णन है। ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्यायके चौथे पादके अन्तर्गत पाँचवें सूत्रमें 'प्राज्ञ' शब्द ईश्वरके अर्थमे प्रयुक्त हुआ है, इसके सिवा और भी बहुत से सूत्रोंमे ईश्वरके स्थानपर 'प्राज्ञ' शब्दका प्रयोग किया गया है। पूज्यपाद स्वामी शङ्कराचार्यने तो ब्रह्मसूत्रके भाष्यमे स्थान-स्थानपर परमेश्वरके बदले 'प्राज्ञ' शब्दका ही प्रयोग किया है। उपनिषदोमे भी अनेक स्थलोंपर 'प्राज्ञ' शब्दका परमेश्वरके स्थानमे प्रयोग किया गया है (बृ० उ० ४ । ३ । २१ और ४ । ३ । ३५) । प्रस्तुत मन्त्रमे साथ-ही-साथ ईश्वरसे भिन्न शरीराभिमानी जीवात्माका भी वर्णन है। यहाँ प्रकरण भी सुषुप्तिका है, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी दृष्टिसे 'प्राज्ञ' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। ब्रह्मसूत्र (१ । ३ । ४२) के भाष्यमें स्वयं शङ्कराचार्यजीने लिखा है कि 'सर्वज्ञतारूप प्रज्ञासे नित्य संयुक्त होनेके कारण 'प्राज्ञ' नाम परमेश्वरका ही है, अतः उपर्युक्त उपनिषद्-मन्त्रमे परमेश्वरका ही वर्णन है।' इसलिये यहाँ केवल 'सुषुप्तस्थान.' पदके बलपर सुषुप्ति-अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका तीसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता, क्योंकि इसके बाद अगले मन्त्रमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इन तीनो अवस्थाओंमें स्थित तीन पादोंके नामसे जिनका वर्णन हुआ है, वे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सम्पूर्ण जगत्के कारण और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हे। इसके सिवा ग्यारहवे मन्त्रमे ओंकारकी तीसरी मात्राके साथ तीसरे पादकी एकता करके उसे जाननेका फल सबको जानना और सम्पूर्ण जगत्को विलीन कर लेना बताया है, इसलिये भी 'प्राज्ञः' पदका वाच्यार्थ कारण-जगत्के अधिष्ठाता परमेश्वरको ही समझना चाहिये। वह प्राज्ञ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका तीसरा पाद है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए ब्रह्मके पाद वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ किसके नाम हैं, इस जिज्ञासापर कहते हैं— एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥ एषः = यह; सर्वेश्वरः = सबका ईश्वर है, एषः = यह; सर्वज्ञः = सर्वज्ञ है; एषः = यह; अन्तर्यामी = सबका अन्तर्यामी है, एषः = यह; सर्वस्य = सम्पूर्ण जगत्का; योनिः = कारण है; हि = क्योंकि; भूतानाम् = समस्त प्राणियोंका; प्रभवाप्ययौ = उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरका तीनों पादोके रूपमें वर्णन किया गया है, वे सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। ये ही सर्वज्ञ और सबके अन्तर्यामी हैं। ये ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं, क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान ये ही हैं। प्रश्नोपनिषद्मे तीनो मात्राओंसे युक्त ओंकारके द्वारा परम पुरुष परमेश्वरका ध्यान करनेकी बात कहकर उसका फल समस्त पापोंसे रहित हो अविनाशी परात्पर पुरुषोत्तमको प्राप्त कर लेना बताया गया है (५ । ५) । अतः पूर्ववर्णित वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ परमेश्वरके ही नाम हैं। अलग-अलग स्थितिमें उन्हींका वर्णन भिन्न-भिन्न नामोसे किया गया है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अब पूर्णब्रह्म परमात्माके चौथे पादका वर्णन करते हैं— नान्तःप्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यम- लक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥ न अन्तःप्रज्ञम् = जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है; न बहिष्प्रज्ञम् = न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है; न उभयतःप्रज्ञम् = न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघनम् = न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञम् = न जाननेवाला है; न अप्रज्ञम् = न नहीं जाननेवाला है; अदृष्टम् = जो देखा नहीं गया हो; अव्यवहार्यम् = जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता;