भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 832 में से

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पृष्ठ 319
  • माण्डूक्योपनिषद् * २९३ अग्राह्यम् = जो पकड़नेमें नहीं आ सकता; अलक्षणम् = जिसका कोई लक्षण (चिह्न) नहीं है; अचिन्त्यम् = जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता; अव्यपदेश्यम् = जो बतलानेमें नहीं आ सकता; एकात्मप्रत्ययसारम् = एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है; प्रपञ्चोपशमम् = जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा; शान्तम् = सर्वथा शान्त, शिवम् = कल्याणमय, अद्वैतम् = अद्वितीय तत्त्व; चतुर्थम् = (परब्रह्म परमात्माका) चौथा पाद है, मन्यन्ते = (इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं; सः आत्मा = वह परमात्मा (है); सः विज्ञेयः = वह जाननेयोग्य (है) ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपको पूर्णब्रह्म परमात्माका चौथा पाद बताया गया है। भाव यह है कि जिसका ज्ञान न तो बाहरकी ओर है, न भीतरकी ओर है और न दोनों ही ओर है; जो न ज्ञानस्वरूप है, न जाननेवाला है और न नहीं जाननेवाला ही है; जो न देखनेमें आ सकता है, न व्यवहारमें लाया जा सकता है, न ग्रहण करनेमें आ सकता है, न चिन्तन करनेमें, न बतलानेमें आ सकता है और न जिसका कोई लक्षण ही है, जिसमें समस्त प्रपञ्चका अभाव है, एकमात्र परमात्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसमें सार (प्रमाण) है—ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व पूर्णब्रह्मका चौथा पाद माना जाता है। इस प्रकार जिनका चार पादोंमें विभाग करके वर्णन किया गया, वे ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको जानना चाहिये। इस मन्त्रमें 'चतुर्थम् मन्यन्ते' पदके प्रयोगसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ परब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना केवल उनका तत्त्व समझानेके लिये ही की गयी है। वास्तवमें अवयवरहित परमात्माके कोई भाग नहीं हैं। जो पूर्ण- ब्रह्म परमात्मा स्थूल जगत्में परिपूर्ण हैं, वे ही सूक्ष्म और कारण-जगत्के अन्तर्यामी और अधिष्ठाता भी हैं, तथा वे ही इन सबसे अलग निर्विशेष परमात्मा हैं। वे सर्वशक्तिमान् भी हैं और सब शक्तियोंसे रहित भी हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वे साकार भी हैं और निराकार भी। वास्तवमें वे हमारी बुद्धि और तर्कसे सर्वथा अतीत हैं ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—उक्त परब्रह्म परमात्माकी उनके वाचक प्रणवके साथ एकता करते हुए कहते हैं— सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥ सः = वह (जिसको चार पादवाला बताया गया है); अयम् = यह, आत्मा = परमात्मा; अध्यक्षरम् = (उसके वाचक) प्रणवके अधिकारमे (प्रकरणमें) वर्णित होनेके कारण, अधिमात्रम् = तीन मात्राओंसे युक्त; ओंकारः = ओंकार है, अकारः = 'अ'; उकारः = 'उ' (और); मकारः = 'म', इति = ये (तीनों), मात्राः = मात्राएँ ही, पादाः = (तीन) पाद हैं, च = और; पादाः = (उस ब्रह्मके तीन) पाद ही, मात्राः = (तीन) मात्राएँ हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—वे परब्रह्म परमात्मा, जिनके चार पादोंका वर्णन किया गया है, यहाँ अक्षरके प्रकरणमें अपने नामसे अभिन्न होनेके कारण तीन मात्राओंवाला ओंकार हैं। 'अ', 'उ' और 'म'—ये तीनों मात्राएँ ही उनके उपर्युक्त तीन पाद हैं। और उनके तीनों पाद ही ओंकारकी तीन मात्राएँ हैं। जिस प्रकार ओंकार अपनी मात्राओंसे अलग नहीं है, उसी प्रकार अपने पादोंसे परमात्मा अलग नहीं हैं। यहाँ पाद और मात्राकी एकता ओंकारके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी उपासनाके लिये की गयी है—ऐसा मालूम होता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—ओंकारकी किस मात्रासे ब्रह्मके किस पादकी एकता है और वह क्यों है, इस जिज्ञासापर तीन मात्राओंका रहस्य समझानेके लिये प्रथम पहले पाद और पहली मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं— जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥ प्रथमा = (ओंकारकी) पहली, मात्रा = मात्रा, अकारः = अकार ही; आप्तेः = (समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् शब्दमात्रमें) व्याप्त होनेके कारण, वा = और, आदिमत्त्वात् = आदिवाला होनेके कारण; जागरितस्थानः = जाग्रत्की भाँति स्थूल जगत्रूप शरीरवाला, वैश्वानरः = वैश्वानर नामक पहला पाद है, यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद =