कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जानता है, [ सः ] ह वै = वह अवश्य ही, सर्वान् = सम्पूर्ण, कामान् = भोगोंको; आप्नोति = प्राप्त कर लेता है; च = और, आदिः = सबका आदि (प्रधान), भवति = बन जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो पहली मात्रा 'अ' है, यह समस्त जगत्के नामोमे अर्थात् किसी भी अर्थको बतलानेवाले जितने भी शब्द हैं, उन सबमें व्याप्त है। स्वर अथवा व्यञ्जन—कोई भी वर्ण अकारसे रहित नहीं है। श्रुति भी कहती है—'अकारो वै सर्वा वाक्' (ऐतरेय आरण्यक० २।३।६)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि अक्षरोंमें (वर्णोंमे) मैं 'अ' हूँ (१०।३३)। तथा समस्त वर्णोंमे 'अ' ही पहला वर्ण है। इसी प्रकार इस स्थूल जगद्रूप विराट्-शरीरमें वे वैश्वानररूप अन्तर्यामी परमेश्वर व्याप्त हैं और विराट्रूपसे सबके पहले स्वयं प्रकट होनेके कारण इस जगत्के आदि भी वे ही हैं। इस प्रकार 'अ' की और जाग्रत्की भाँति प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले इस स्थूल जगद्रूप शरीरमें व्याप्त वैश्वानर नामक प्रथम पादकी एकता होनेके कारण 'अ' ही पूर्णब्रह्म परमेश्वरका पहला पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार अकार और विराट्-शरीरके आत्मा परमेश्वरकी एकताको जानता है और उनकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको अर्थात् इच्छित पदार्थोंको पा लेता है और जगत्मे प्रधान—सर्वमान्य हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—अब दूसरे पादकी और दूसरी मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं— स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥ द्वितीया = (ओंकारकी) दूसरी, मात्रा = मात्रा; उकारः = 'उ', उत्कर्षात् = ('अ' से) उत्कृष्ट होनेके कारण; वा = और; उभयत्वात् = दोनों भाववाला होनेके कारण, स्वप्नस्थानः = स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगद्रूप शरीरवाला; तैजसः = तैजस नामक (दूसरा पाद) है; यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है, [सः] ह वै = वह अवश्य ही; ज्ञान- संततिम् = ज्ञानकी परम्पराको; उत्कर्षति = उन्नत करता है; च = और; समानः = समान भाववाला; भवति = हो जाता है; अस्य = इसके, कुले = कुलमें; अब्रह्मवित् = वेदरूप ब्रह्मको न जाननेवाला; न = नहीं; भवति = होता ॥ १० ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारकी दूसरी मात्रा जो 'उ' है, यह 'अ' से उत्कृष्ट (ऊपर उठा हुआ) होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा 'अ' और 'म' इन दोनोंके बीचमें होनेके कारण उन दोनोंके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः यह उभयस्वरूप है। इसी प्रकार वैश्वानरसे तैजस (हिरण्यगर्भ) उत्कृष्ट है तथा वैश्वानर और प्राज्ञके मध्यगत होनेसे वह उभयसम्बन्धी भी है। इस समानताके कारण ही 'उ' को 'तैजस' नामक द्वितीय पाद कहा गया है। भाव यह है कि इस स्थूल जगत्के प्राकट्यसे पहले परमेश्वरके आदि सङ्कल्पद्वारा जो सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसका वर्णन मानस सृष्टिके नामसे आता है, जिसमे समस्त तत्त्व तन्मात्राओंके रूपमें रहते हैं, स्थूलरूपमें परिणत नहीं होते, उस सूक्ष्म जगद्रूप शरीरमे चेतन प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ परमेश्वर इसके अधिष्ठाता होकर रहते हैं। तथा कारण-जगत् और स्थूल-जगत्— इन दोनोंसे ही सूक्ष्म जगत्का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये वे कारण और स्थूल दोनों रूपवाले हैं। इस तरह 'उ' की और मानसिक सृष्टिके अधिष्ठाता तैजसरूप दूसरे पादकी समानता होनेके कारण 'उ' ही पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'उ' और तेजोमय हिरण्यगर्भ-स्वरूपकी एकताके रहस्यको समझ लेता है, वह स्वयं इस जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण इस ज्ञानकी परम्पराको उन्नत करता है—उसे बढाता है तथा सर्वत्र समभाववाला हो जाता है, क्योंकि जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंको समझ लेनेके कारण उसका वास्तविक रहस्य समझमे आ जानेसे उसकी विषमताका नाश हो जाता है। इसलिये उससे उत्पन्न हुई सन्तान भी कोई ऐसी नहीं होती, जिसको हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरके उपर्युक्त रहस्यका ज्ञान न हो जाय ॥ १० ॥ सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥