कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीया = ( ओंकारकी ) तीसरी; मात्रा = मात्रा; मकारः = 'म' ही; मितेः = माप करनेवाला (जाननेवाला) होनेके कारण; वा = और; अपीतेः = विलीन करनेवाला होनेसे; सुषुप्तस्थानः = सुषुप्तिकी भाँति कारणमें विलीन जगत् ही जिसका शरीर है; प्राज्ञः = प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है; [ सः ] ह वै = वह अवश्य ही; इदम् = इस; सर्वम् = सम्पूर्ण कारण-जगत्को; मिनोति = माप लेता है अर्थात् भलीभाँति जान लेता है; च = और; अपीतिः = सबको अपनेमें विलीन करनेवाला; भवति = हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो तीसरी मात्रा 'म' है, यह 'मा' धातुसे बना है। 'मा' धातुका अर्थ माप लेना यानी अमुक वस्तु इतनी है, यह समझ लेना है। यह 'म' ओंकारकी अन्तिम मात्रा है; 'अ' और 'उ' के पीछे उच्चरित होती है—इस कारण दोनोंका माप इसमें आ जाता है; अतः यह उनको जाननेवाला है। तथा 'म' का उच्चारण होते-होते मुख बंद हो जाता है, 'अ' और 'उ' दोनों उसमें विलीन हो जाते हैं; अतः वह उन दोनों मात्राओंको अन्तमें विलीन करनेवाला भी है। इसी प्रकार सुषुप्तस्थानीय कारण-जगत्का अधिष्ठाता प्राज्ञ भी सर्वज्ञ है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित जगत्को जाननेवाला है। कारण-जगत्से ही सूक्ष्म और स्थूल जगत्की उत्पत्ति होती है और उसीमें उनका लय भी होता है। इस प्रकार 'म' की और कारण-जगत्के अधिष्ठाता प्राज्ञ नामक तीसरे पादकी समता होनेके कारण 'म' रूप तीसरी मात्रा ही पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'म' और 'प्राज्ञ' स्वरूप परमेश्वरकी एकताको जानता है—इस रहस्यको समझकर ओंकारके स्मरणद्वारा परमेश्वरका चिन्तन करता है, वह इस मूलसहित सम्पूर्ण जगत्को भली प्रकार जान लेता है और सबको विलीन करनेवाला हो जाता है, अर्थात् उसकी बाह्य दृष्टि निवृत्त हो जाती है। अतः वह सर्वत्र एक परब्रह्म परमेश्वरको ही देखनेवाला बन जाता है ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—मात्रारहित ओंकारकी चौथे पादके साथ एकताका प्रतिपादन करते हुए इस उपनिषद्का उपसंहार करते हैं— अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥ १२ ॥ एवम् = इसी प्रकार; अमात्रः = मात्रारहित; ओंकारः = प्रणव ही; अव्यवहार्यः = व्यवहारमें न आनेवाला, प्रपञ्चोपशमः = प्रपञ्चसे अतीत, शिवः = कल्याणमय; अद्वैतः = अद्वितीय; चतुर्थः = पूर्ण ब्रह्मका चौथा पाद है; [ सः ] आत्मा = वह आत्मा; एव = अवश्य ही, आत्मना = आत्माके द्वारा, आत्मानम् = परात्पर ब्रह्म परमात्मामें; संविशति = पूर्णतया प्रविष्ट हो जाता है, यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है, यः एवम् वेद = जो इस प्रकार जानता है ॥ १२ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारका जो मात्रारहित, बोलनेमें न आनेवाला, निराकार स्वरूप है, वही मन-वाणीका अविषय होनेसे व्यवहारमें न लाया जा सकनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय, अद्वितीय—निर्गुण-निराकाररूप चौथा पाद है। भाव यह है कि जिस प्रकार तीन मात्राओंकी पहले बताये हुए तीन पादोंके साथ समता है, उसी प्रकार ओंकारके निराकार स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके निर्गुण-निराकार निर्विशेषरूप चौथे पादके साथ समता है। जो मनुष्य इस प्रकार ओंकार और परब्रह्म परमात्माकी अर्थात् नाम और नामीकी एकताके रहस्यको समझकर परब्रह्म परमात्माको पानेके लिये उनके नाम-जपका अवलम्ब लेकर तत्परतासे साधन करता है, वह निस्सन्देह आत्मासे आत्मामें अर्थात् परात्पर परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है। 'जो इस प्रकार जानता है' इस वाक्यको दो बार कहकर उपनिषद्की समाप्ति सूचित की गयी है। परब्रह्म परमात्मा और उनके नामकी महिमा अपार है, उसका कोई पार नहीं पा सकता। इस प्रकरणमें उन असीम पूर्णब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना उनके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों सगुण रूपोंकी और निर्गुण-निराकार स्वरूपकी एकता दिखानेके लिये तथा नाम और नामीकी सब प्रकारसे एकता दिखानेके लिये एव उनकी सर्वभवन-