भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 832 में से

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पृष्ठ 330

३०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; त्वचा=चमड़ी- द्वारा, ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो, ह=अवश्य ही (अब भी मनुष्य); अन्नम्=अन्नको; स्पृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥८॥ ( तब उस पुरुषने ) तत्=उसको, मनसा=मनसे, अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा= मनसे भी, ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो, ह=अवश्य ही, (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको, ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥९॥ (फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा, (परंतु) तत्=उसको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह; एनत्= इसको, शिश्नेन=उपस्थद्वारा, ह=ही, अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विसृज्य= अन्नका त्याग करके, एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी, मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥ तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैपोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ (अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको, अपानेन=अपानवायुके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा; ( इस वार उसने) तत्=उसको, आवयत्=ग्रहण कर लिया, सः=वह, एषः=यह अपानवायु ही, अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है, यत्=जो, वायुः=वायु, अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें, वै=प्रसिद्ध है; यत्= जो; एषः=यह, वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥ व्याख्या—अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाहा, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की, तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राण-वायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥१०॥ स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचामि- व्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥