भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 832 में से

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पृष्ठ 329
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०३ व्याख्या—लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है; उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता, परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥ तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥४॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियके द्वारा,* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=घ्राणेन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य, अन्नम्=अन्नको; अभिप्राण्य=सूँघकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् घ्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको घ्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको घ्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्= उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥६॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा ह=ही अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्सन्देह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥७॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको;
  • घ्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा घ्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ घ्राणेन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेमे पूर्वापरविरोध आयेगा।
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