भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

३०२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ग्रहण की जाती है; अस्याम् = उस देवता ( के भोजन ) मे; अशनायापिपासे = भूख और प्यास--दोनों, एव = ही; भागिन्यौ = भागीदार; भवतः = होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या-तत्र भूख और प्यास-ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं-'भगवन् ! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमे हमे स्थापित कीजिये ।' उनके यो कहनेपर उनसे सृष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा- 'तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है । तुम दोनोंको म इन देवताओंके ही स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोको भागीदार बना देता हूँ।' सृष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था, इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमे ये क्षुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ क्षुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने, ईक्षत = फिर विचार किया; नु = निश्चय ही; इमे = ये सब; लोकाः = लोक; च = और; लोकपालाः = लोकपाल, च = भी; ( रचे गये, अब ) एभ्यः = इनके लिये; अन्नम् सृजै इति = मुझे अन्नकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥ व्याख्या-इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया-'ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये-इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अन्न भी होना चाहिये-भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उसकी (अन्नकी) भी रचना करूँ' ॥ १ ॥ सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने; अपः = जलोंको ( पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको ); अभ्यतपत् = तपाया ( सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की ), ताभ्यः अभितप्ताभ्यः = उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे, मूर्तिः = मूर्ति, अजायत = उत्पन्न हुई; वै = निश्चय ही, या = जो, सा = वह; मूर्तिः = मूर्ति; अजायत = उत्पन्न हुई, तत् वै = वही, अन्नम् = अन्न है ॥ २ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलोंको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया-अपने सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके सङ्कल्पद्वारा सचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ, वही अन्न-देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥ तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्या- हृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ सृष्टम् = उत्पन्न किया हुआ, तत् = वह, एनत् = यह अन्न, पराङ् = ( भोक्ता पुरुषसे ) विमुख होकर, अत्यजिघांसत् = भागनेकी चेष्टा करने लगा, तत् = ( तब उस पुरुषने ) उसको, वाचा = वाणीद्वारा; अजिघृक्षत् = ग्रहण करनेकी इच्छा की; ( परंतु वह ) तत् = उसको, वाचा = वाणीद्वारा, ग्रहीतुम् न अशक्नोत् = ग्रहण नहीं कर सका, यत् = यदि, सः = वह, एनत् = इस अन्नको, वाचा = वाणीद्वारा; ह = ही, अग्रहैष्यत् = ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य ) ह = अवश्य ही, अन्नम् अभिव्याहृत्य = अन्नका वर्णन करके, एव = ही; अत्रप्स्यत् = तृप्त । जाता ॥ ३ ॥