भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 832 में से

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पृष्ठ 327
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०१ व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया । उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया । इसमे हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।' सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है, इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है, क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है । जब सब देवताओंगने उस शरीरको पसन्द किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमे प्रवेश कर जाओ ॥ ३ ॥ अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्रा- विशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभि प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ अग्निः = (तब) अग्निदेवता, वाक् = वाक्-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, मुखम् प्राविशत् = मुखमे प्रविष्ट हो गया, वायुः = वायुदेवता, प्राणः = प्राण, भूत्वा = बनकर, नासिके प्राविशत् = नासिकाके छिद्रोमे प्रविष्ट हो गया, आदित्यः = सूर्यदेवता, चक्षुः = नेत्र-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, अक्षिणी प्राविशत् = आँखोंके गोलकोंमें प्रविष्ट हो गया, दिशः = दिशाओंके अभिमानी देवता, श्रोत्रम् = श्रोत्र-इन्द्रिय, भूत्वा = बनकर, कर्णौ प्राविशन् = कानोंमें प्रविष्ट हो गये, ओषधिवनस्पतयः = ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता, लोमानि = रोएँ, भूत्वा = बनकर, त्वचम् प्राविशन् = त्वचा मे प्रविष्ट हो गये, चन्द्रमाः = चन्द्रमा, मनः = मन, भूत्वा = बनकर, हृदयम् प्राविशत् = हृदयमे प्रविष्ट हो गया, मृत्युः = मृत्युदेवता, अपानः = अपानवायु, भूत्वा = बनकर, नाभिम् प्राविशत् = नाभिमें प्रविष्ट हो गया, आपः = जलका अभिमानी देवता, रेतः = वीर्य, भूत्वा = बनकर, शिश्नम् प्राविशन् = लिङ्गमे प्रविष्ट हो गया ॥ ४ ॥ व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट हो गये । उन्होंने जिह्वाको अपना आश्रय बना लिया । यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमे प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये । फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके छिद्रोंमे (उसी मार्गसे समस्त शरीरमे) प्रविष्ट हो गये । अश्विनीकुमार भी घ्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामे प्रविष्ट हो गये—यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है, क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है । उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर आँखोंमे प्रविष्ट हो गये । दिगभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये । ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमे प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा मनका रूप धारण करके हृदयमे प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभिमे प्रविष्ट हो गये । जलके अधिष्ठातृ देवता वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार सब-के-सब देवता इन्द्रियोके रूपमे अपने-अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये ॥ ४ ॥ तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति । ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥५॥ तम् = उस परमात्मासे, अशनायापिपासे = भूख और प्यास—ये दोनों, अब्रूताम् = बोलीं; आवाभ्याम् = हमारे लिये भी; अभिप Build= (स्थानकी) व्यवस्था कीजिये, इति = यह (सुनकर), ते = उनसे, अब्रवीत् = (परमात्माने) कहा, वाम् = तुम दोनोंको (मै), एतासु = इन सब, देवतासु = देवताओंमें, एव = ही, आभजामि = भाग दिये देता हूँ, एतासु = इन (देवताओ) में ही (तुम्हें), भागिन्यौ = भागीदार, करोमि इति = बनाता हूँ, तस्मात् = इसलिये यस्यै कस्यै च = जिस किसी भी, देवतायै = देवताके लिये, हविः = हवि (भिन्न-भिन्न विषय), गृह्यते = (इन्द्रियोंद्वारा)