कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अधिष्ठाता है, अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है । फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ । यहाँ लिङ्गसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ— यह बात भी समझ लेनी चाहिये ॥ ४ ॥ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्ना- यतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ ताः=वे, एताः सृष्टाः= परमात्माद्वारा रचे हुए ये सब, देवताः=अग्नि आदि देवता, अस्मिन् = इस (संसाररूप), महति = महान्; अर्णवे = समुद्रमें; प्रापतन् = आ पड़े, (तब परमात्माने) तम् = उस (समस्त देवताओंके समुदाय) को; अशनायापिपासाभ्याम् = भूख और प्याससे, अन्ववार्जत् =युक्त कर दिया, (तब) ताः =वे सब अग्नि आदि देवता; एनम् अब्रुवन् =इस परमात्मासे बोले, (भगवन्) नः=हमारे लिये; आयतनम् प्रजानीहि = एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये; यस्मिन्=जिसमें; प्रतिष्ठिताः= स्थित रहकर; [वयम् = हमलोग;] अन्नम् = अन्न; अदाम इति = भक्षण करें ॥ १ ॥ व्याख्या—परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमे आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला, जिससे वे उस समष्टि-शरीरमे ही रहे । तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे सयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले—'भगवन् ! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें—अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें' ॥ १ ॥ ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥२॥ ताभ्यः = (परमात्मा) उन देवताओंके लिये; गाम् = गौका शरीर; आनयत् = लाये, (उसे देखकर) ताः = उन्होंने; अब्रुवन् = कहा; नः = हमारे लिये; अयम् = यह; अलम् = पर्याप्त; न वै= नहीं है; इति = इस प्रकार उनके कहनेपर (परमात्मा), ताभ्यः = उनके लिये; अश्वम् = घोड़ेका शरीर, आनयत् = लाये, (उसे देखकर भी) ताः = उन्होंने (फिर वैसे ही); अब्रुवन् = कहा कि, अयम् = यह भी; नः = हमारे लिये; अलम् = पर्याप्त, न वै इति = नहीं हे ॥ २ ॥ व्याख्या—इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्त्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया । उसे देखकर उन्होंने कहा—'भगवन् ! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका । इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये ।' तब परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया । उसे देखकर वे फिर बोले—'भगवन् ! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा काम नहीं चल सकता । आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये' ॥ २ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥ ताभ्यः= (तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम् = मनुष्यका शरीर; आनयत् = लाये; (उसे देखकर) ताः= वे (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले, बत=बस, सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही, पुरुषः =मनुष्य शरीर, सुकृतम् = (परमात्माकी) सुन्दर रचना है, ता. अब्रवीत् = (फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम् = अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें, प्रविशत इति = प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥