भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 325
  • ऐतरेयोपनिषद् * २९९ पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया । यहाँ 'पुरुष' शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है—यह विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे—कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है । अतः यहाँ 'पुरुष' शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है ॥ ३ ॥ तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षीभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥४ ॥ (परमात्माने) तम् = उस (हिरण्यगर्भरूप पुरुष) को लक्ष्य करके; अभ्यतपत् = संकल्परूप तप किया; अभितप्तस्य = उस तपसे तपे हुए; तस्य = हिरण्यगर्भके शरीरसे; यथाण्डम् = (पहले) अण्डेकी तरह (फूटकर); मुखम् = मुख-छिद्र; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; मुखात् = मुखसे; वाक् = वाक्-इन्द्रिय (और); वाचः = वाक् इन्द्रियसे; अग्निः = अग्निदेवता प्रकट हुआ (फिर), नासिके = नासिकाके दोनों छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; नासिकाभ्याम् = नासिका-छिद्रोंमेंसे, प्राणः = प्राण उत्पन्न हुआ (और); प्राणात् = प्राणसे, वायुः = वायुदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); अक्षिणी = दोनों आँखोंके छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; अक्षिभ्याम् = आँखोंके छिद्रोंमेंसे; चक्षुः = नेत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); चक्षुषः = नेत्र-इन्द्रियसे, आदित्यः = सूर्य प्रकट हुआ; (फिर) कर्णौ = दोनों कानोंके छिद्र, निरभिद्येताम् = प्रकट हुए; कर्णाभ्याम् = कानोंसे; श्रोत्रम् = श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); श्रोत्रात् = श्रोत्र-इन्द्रियसे; दिशः = दिशाएँ प्रकट हुईं (फिर); त्वक् = त्वचा; निरभिद्यत = प्रकट हुई, त्वचः = त्वचासे; लोमानि = रोम उत्पन्न हुए (और); लोमभ्यः = रोमोंसे; ओषधिवनस्पतयः = ओषधि और वनस्पतियाँ प्रकट हुईं (फिर), हृदयम् = हृदय; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; हृदयात् = हृदयसे, मनः = मनका आविर्भाव हुआ (और); मनसः = मनसे, चन्द्रमाः = चन्द्रमा उत्पन्न हुआ (फिर); नाभिः = नाभि, निरभिद्यत = प्रकट हुई; नाभ्याः = नाभिसे, अपानः = अपानवायु प्रकट हुआ (और); अपानात् = अपानवायुसे, मृत्युः = मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); शिश्नम् = लिङ्ग; निरभिद्यत = प्रकट हुआ; 'शिश्नात् = लिङ्गसे, रेतः = वीर्य (और); रेतसः = वीर्यसे, आपः = जल उत्पन्न हुआ ॥ ४ ॥ —इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग-उपाङ्गोंको व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फटकर मुख-छिद्र निकला । मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक्-इन्द्रियसे उसका अधिष्ठातृ-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ । फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ । यहाँ घ्राणेन्द्रियका अलग वर्णन नहीं है, अतः घ्राण- इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए—यों समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—यह समझ लेना चाहिये । फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ । फिर कानोंके दोनों छिद्र निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुईं; उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए और रोमोंसे ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं । फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ । फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ । नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिये । यहाँ अपानवायु मल-त्यागमे हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है । परन्तु मृत्यु अपानका अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका