भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 324

२९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * हो। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंकी सर्वथा निवृत्तिके लिये तीन वार 'शान्तिः' पद- का उच्चारण किया गया है। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, इसलिये उनके स्मरणसे शान्ति निश्चित है। प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥१॥ ॐ = ॐ; इदम् = यह जगत्, अग्रे = (प्रकट होनेसे) पहले, एकः = एकमात्र, आत्मा = परमात्मा, वै = ही; आसीत् = था; अन्यत् = (उसके सिवा) दूसरा, किंचन = कोई, एव = भी, मिषत् = चेष्टा करनेवाला; न = नहीं था; सः = उस (परम पुरुष परमात्मा) ने. नु = (मैं) निश्चय ही लोकान् सृजै = लोकोंकी रचना करूँ, इति = इस प्रकार; ईक्षत = विचार किया ॥१॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टिरचना-विषयक प्रथम सङ्कल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी। उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने यह विचार किया कि 'मैं प्राणियोंके कर्म-फल भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥ स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥ सः = उसने, अम्भः = अम्भ (द्युलोक तथा उसके ऊपरके लोक), मरीचीः = मरीचि (अन्तरिक्ष); मरम् = मर (मर्त्यलोक) और आपः = जल (पृथ्वीके नीचेके लोक) इमान् = इन सब; लोकान् असृजत = लोकोंकी रचना की, दिवम् परेण = द्युलोक-स्वर्गलोकसे ऊपरके लोक प्रतिष्ठा = (तथा) उनका आधारभूत, द्यौः = द्युलोक भी; अदः = वे सब, अम्भः = 'अम्भ' के नामसे कहे गये है, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष लोक (भुवर्लोक) ही मरीचयः = मरीचि है (तथा); पृथिवी = यह पृथ्वी ही, मरः = मर-मृत्युलोकके नामसे कही गयी है (और); याः = जो, अधस्तात् = (पृथ्वीके) नीचे-भीतरी भागमे (स्थूल पातालादि लोक) है, ताः = वे आपः = जलके नामसे कहे गये हैं ॥ २ ॥ व्याख्या-यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अम्भ, मरीचि, मर और जल-इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है कि स्वर्गलोकमे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्य लोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक-इन पाँचों लोकोंको यहाँ 'अम्भ' नामसे कहा गया है। उसके नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमे सूर्य, चन्द्र और तारागण-ये सब गिरनेवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है। उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है-जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ 'मर' के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि लोक हैं, वे 'आपः' के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्मे जितने भी लोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एव सप्त लोकोंके नामसे प्रसिद्ध है, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की ॥ २ ॥ स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥ सः = उसने, ईक्षत = फिर विचार किया; इमे = ये, नु = तो हुए; लोकाः = लोक, (अत्र) लोकपालान् नु सृजै = लोकपालोंकी भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये, इति = यह विचार करके, सः = उसने; अद्भ्यः = जलसे, एव = ही, पुरुषम् = हिरण्यगर्भरूप पुरुषको, समुद्धृत्य = निकालकर, अमूर्छयत् = उसे मूर्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥ व्याख्या-इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि 'ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी रक्षा करनेवाले लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये, अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे।' यह सोचकर उन्होंने जलमेसे अर्थात् जल आदि सूक्ष्म 'महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय