भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 832 में से

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पृष्ठ 323

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऐतरेयोपनिषद् ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय-उपनिषद्के नामसे कहा गया है । इन तीन अध्यायोंमे ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है, इस कारण इन्हींको 'उपनिषद्' माना है । शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॐ=हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्, मे=मेरी; वाक्=वाक्-इन्द्रिय, मनसि=मनमें, प्रतिष्ठिता=स्थित हो जाय; मे=मेरा; मनः= मन, वाचि=वाक्-इन्द्रियमें; प्रतिष्ठितम्= स्थित हो जाय, आविः= हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर; मे=मेरे लिये; आवीः एधि= (तू ) प्रकट हो, मे= ( हे मन और वाणी ! तुम दोनों ) मेरे लिये, वेदस्य=वेदविषयक ज्ञानको, आणिस्थः= लानेवाले बनो; मे=मेरा; श्रुतम्= सुना हुआ ज्ञान; मा प्रहासीः= ( मुझे ) न छोड़े; अनेन अधीतेन=इस अध्ययनके द्वारा; अहोरात्रान्= ( मैं ) दिन और रात्रियोंको, संदधामि=एक कर दूँ, ऋतम्= ( मै ) श्रेष्ठ शब्दोंको ही , वदिष्यामि=बोलूँगा, सत्यम्=सत्य ही; वदिष्यामि=बोला करूँगा, तत्=वह (ब्रह्म); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत् =वह ( ब्रह्म ), वक्तारम् अवतु=आचार्यकी रक्षा करे, अवतु माम्=रक्षा करे मेरी ( और ), अवतु वक्तारम्= रक्षा करे ( मेरे ) आचार्यकी, अवतु वक्तारम्=रक्षा करे ( मेरे ) आचार्यकी; ओम् शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप है । व्याख्या—इस शान्तिपाठमे सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है । प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन् ! मेरी वाणी मनमे स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय, अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायें । ऐसा न हो कि मै वाणीसे एक पाठ पढता रहूँ और मन दूसरा ही चिन्तन करता रहे, या मनमे दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ । मेरे सङ्कल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायें । हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये—अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये । (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक अपने मन और वाणीसे कहता है कि ) हे मन और वाणी ! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो—तुम्हारी सहायतासे में वेदविषयक ज्ञान प्राप्त कर सकूँ । मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमे आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मै उसे कभी न भूलूँ । मेरी इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूँ । अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ । मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते । मै अपनी वाणीसे सदा ऐसे ही शब्दोका उच्चारण करूँगा, जो सर्वथा उत्तम हो, जिनमे किसी प्रकारका दोष न हो, तथा जो कुछ बोलूँगा, सर्वथा सत्य बोलूँगा—जैसा देखा, सुना और समझा हुआ भाव है, ठीक वही भाव वाणीद्वारा प्रकट करूँगा । उसमे किसी प्रकारका छल नहीं करूँगा । ( इस प्रकार अपने मन और वाणीको दृढ बनाकर अब पुनः परमात्मासे प्रार्थना करता है—) वे परब्रह्म परमात्मा मेरी रक्षा करें । वे परमेश्वर मुझे ब्रह्मविद्या सिखाने- वाले आचार्यकी रक्षा करें । वे रक्षा करें मेरी और मेरे आचार्यकी, जिससे मेरे अध्ययनमे किसी प्रकारका विघ्न उपस्थित न उ० अं० ३८—