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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

३०२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ग्रहण की जाती है; अस्याम् = उस देवता ( के भोजन ) मे; अशनायापिपासे = भूख और प्यास--दोनों, एव = ही; भागिन्यौ = भागीदार; भवतः = होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या-तत्र भूख और प्यास-ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं-'भगवन् ! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमे हमे स्थापित कीजिये ।' उनके यो कहनेपर उनसे सृष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा- 'तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है । तुम दोनोंको म इन देवताओंके ही स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोको भागीदार बना देता हूँ।' सृष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था, इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमे ये क्षुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ क्षुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने, ईक्षत = फिर विचार किया; नु = निश्चय ही; इमे = ये सब; लोकाः = लोक; च = और; लोकपालाः = लोकपाल, च = भी; ( रचे गये, अब ) एभ्यः = इनके लिये; अन्नम् सृजै इति = मुझे अन्नकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥ व्याख्या-इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया-'ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये-इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अन्न भी होना चाहिये-भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उसकी (अन्नकी) भी रचना करूँ' ॥ १ ॥ सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २ ॥ सः = उस ( परमात्मा ) ने; अपः = जलोंको ( पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको ); अभ्यतपत् = तपाया ( सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की ), ताभ्यः अभितप्ताभ्यः = उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे, मूर्तिः = मूर्ति, अजायत = उत्पन्न हुई; वै = निश्चय ही, या = जो, सा = वह; मूर्तिः = मूर्ति; अजायत = उत्पन्न हुई, तत् वै = वही, अन्नम् = अन्न है ॥ २ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलोंको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया-अपने सङ्कल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके सङ्कल्पद्वारा सचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ, वही अन्न-देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥ तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्या- हृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ सृष्टम् = उत्पन्न किया हुआ, तत् = वह, एनत् = यह अन्न, पराङ् = ( भोक्ता पुरुषसे ) विमुख होकर, अत्यजिघांसत् = भागनेकी चेष्टा करने लगा, तत् = ( तब उस पुरुषने ) उसको, वाचा = वाणीद्वारा; अजिघृक्षत् = ग्रहण करनेकी इच्छा की; ( परंतु वह ) तत् = उसको, वाचा = वाणीद्वारा, ग्रहीतुम् न अशक्नोत् = ग्रहण नहीं कर सका, यत् = यदि, सः = वह, एनत् = इस अन्नको, वाचा = वाणीद्वारा; ह = ही, अग्रहैष्यत् = ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य ) ह = अवश्य ही, अन्नम् अभिव्याहृत्य = अन्नका वर्णन करके, एव = ही; अत्रप्स्यत् = तृप्त । जाता ॥ ३ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०३ व्याख्या—लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है; उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता, परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥ तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥४॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियके द्वारा,* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=घ्राणेन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य, अन्नम्=अन्नको; अभिप्राण्य=सूँघकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् घ्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको घ्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको घ्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्= उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥६॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको श्रोत्रेण=कानोंद्वारा ह=ही अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्सन्देह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥७॥ (तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको;
  • घ्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा घ्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ घ्राणेन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेमे पूर्वापरविरोध आयेगा।

३०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; त्वचा=चमड़ी- द्वारा, ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो, ह=अवश्य ही (अब भी मनुष्य); अन्नम्=अन्नको; स्पृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥८॥ ( तब उस पुरुषने ) तत्=उसको, मनसा=मनसे, अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा= मनसे भी, ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह, एनत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो, ह=अवश्य ही, (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको, ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥ व्याख्या—तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥९॥ (फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा, (परंतु) तत्=उसको, शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका, यत्=यदि; सः=वह; एनत्= इसको, शिश्नेन=उपस्थद्वारा, ह=ही, अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विसृज्य= अन्नका त्याग करके, एव=ही; अत्रप्स्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ व्याख्या—फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाहा, परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी, मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तृप्त हो जाते, परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥ तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैपोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ (अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको, अपानेन=अपानवायुके द्वारा, अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाहा; ( इस वार उसने) तत्=उसको, आवयत्=ग्रहण कर लिया, सः=वह, एषः=यह अपानवायु ही, अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है, यत्=जो, वायुः=वायु, अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें, वै=प्रसिद्ध है; यत्= जो; एषः=यह, वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥ व्याख्या—अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाहा, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की, तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राण-वायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥१०॥ स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचामि- व्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०५

सः = (तत्र) उस (सृष्टिके रचयिता परमेश्वर) ने, ऐक्षत = सोचा कि, नु = निश्चय ही; इदम् = यह; मत् ऋते = मेरे बिना, कथम् = किस प्रकार, स्यात् = रहेगा, इति = यह सोचकर; ( पुनः ) सः = उसने, ऐक्षत = विचार किया कि, यदि = यदि; वाचा = ( उस पुरुषने मेरे बिना ही केवल) वाणीद्वारा, अभिव्याहृतम् = बोलने की क्रिया कर ली; यदि = यदि; प्राणेन = प्राण-इन्द्रियद्वारा, अभिप्राणितम् = सूंघनेकी क्रिया कर ली, यदि = यदि, चक्षुषा = नेत्रद्वारा, दृष्टम् = देख लिया; यदि = यदि, श्रोत्रेण = कर्ण-इन्द्रियद्वारा, श्रुतम् = सुन लिया, यदि = यदि, त्वचा = त्वक्-इन्द्रियद्वारा, स्पृष्टम् = स्पर्श कर लिया; यदि = यदि, मनसा = मनद्वारा, ध्यातम् = मनन कर लिया; यदि = यदि, अपानेन = अपानद्वारा; अभ्यपानितम् = अवग्रहण आदि अपान-सम्बन्धी क्रिया कर ली (तथा) यदि = यदि; शिश्नेन = उपस्थसे, विसृष्टम् = मूत्र और वीर्यका त्याग कर लिया; अथ = तो फिर; अहम् = मैं, कः = कौन हूँ; इति = यह सोचकर, (पुनः) सः = उसने; ऐक्षत = विचार किया कि, कतरेण = (पैर और मस्तक—इन दोनोंमेंसे) किस मार्गसे, प्रपद्यै इति = मुझे इसमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ११ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य शरीरधारी पुरुषने उस आहारको ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्रष्टा परमात्माने फिर विचार किया—'यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा ? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा ?'* साथ ही यह भी विचार किया कि 'यदि मेरे महयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा बोलनेकी क्रिया करली, प्राण-इन्द्रियसे सूँघनेका काम कर लिया, प्राणोंमें वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रेन्द्रियद्वारा देख लिया, कर्णेन्द्रियद्वारा सुन लिया, त्वक् इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया, और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर ली, तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया ? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है।' यह सोचकर परमात्माने विचार किया कि मे इस मनुष्य शरीरमें पैर और मस्तक—इन दोमेंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ ? ॥ ११ ॥ स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्धतिर्नाम द्वारस्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः, अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ (यों विचारकर ) सः = उसने, एतम् एव = इस (मनुष्य शरीर की), सीमानम् = सीमाको, विदार्य = चीरकर; एतया द्वारा = इसके द्वारा, प्रापद्यत = उस सजीव शरीर मे प्रवेश किया, सा = वह; एषा = यह; द्वाः = द्वार, विद्धतिः नाम = विदृति नामसे प्रसिद्ध है; तत् = वही, एतत् = यह; नान्दनम् = आनन्द देनेवाला अर्थात् ब्रह्म प्राप्तिका द्वार है; तस्य = उस परमेश्वरके; त्रयः = तीन; आवसथाः = आश्रय (उपलब्धि-स्थान) हैं; त्रयः = तीन, स्वप्नाः = स्वप्न हैं, अयम् = यह (हृदय-गुहा ); आवसथः = एक स्थान है; अयम् = यह ( परमधाम ), आवसथः = दूसरा स्थान है; अयम् = यह ( सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ); आवसथः इति = तीसरा स्थान है ॥ १२ ॥ व्याख्या-परमात्मा इस मनुष्य शरीरकी सीमा ( मूर्धा ) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चीरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमे प्रविष्ट हो गये। वह यह द्वार विदृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विदृति नामका द्वार ( ब्रह्मरन्ध्र ) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान है और स्वप्न भी तीन है। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका स्थान है। दूसरा विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है—जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न है ॥ १२ ॥

  • इसीलिये तो भगवान्ने गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो ( १० । ३९) । उ० अ० ३९-४०-

३०६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदमदर्शमिती ३ ॥ १३ ॥ जातः सः = मनुष्यरूपमें प्रकट हुए उस पुरुषने, भूतानि = पञ्च महाभूतोंकी अर्थात् भौतिक जगत्की रचनाको; अभिव्यैख्यत् = चारों ओरसे देखा, ( और ) इह = यहाँ, अन्यम् = दूसरा, किम् = कौन है; इति = यह, वावदिषत् = कहा; सः = ( तब ) उसने, एतम् = इस, पुरुषम् = अन्तर्यामी परम पुरुषको, एव = ही, ततमम् = सर्वव्यापी, ब्रह्म = परब्रह्मके रूपमे, अपश्यत् = देखा, (और यह प्रकट किया) [ अहो ] इति ३ = अहो ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि; इदम् = इस परब्रह्म परमात्माको, अदर्शम् = मैने देख लिया ॥ १३ ॥ व्याख्या-मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारो ओरसे देखा और मन ही-मन इस प्रकार कहा---'इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है ? क्योकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई-न कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये।' इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके रूपमे प्रत्यक्ष किया । तब वह आनन्दमें भरकर मन ही-मन कहने लगा--'अहो ! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैने परब्रह्म परमात्माको देख लिया-साक्षात् कर लिया।' इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता भर्ता परमात्माकी सत्तामे विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हे जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है । परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य शरीरसे ही हो सकता है, दूसरे शरीरसे नहीं । अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये । इस अध्यायमे मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके लिये ही सृष्टि रचनाका वर्णन किया गया है ॥ १३ ॥ तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥ तस्मात् = इसीलिये, इदन्द्रः नाम = वह 'इदन्द्र' नामवाला है, ह = वास्तवमे; इदन्द्रः नाम वै = वह 'इदन्द्र' नामवाला ही है, ( परतु ) इदन्द्रम् = इदन्द्र; सन्तम् = होते हुए ही, तम् = उस परमात्माको; परोक्षेण = परोक्षभावसे ( गुप्त नामसे ), इन्द्रः = 'इन्द्र', इति = यों, आचक्षते = पुकारते हैं, हि = क्योकि, देवाः = देवतालोग, परोक्षप्रियाः इव = मानो परोक्षभावसे कही हुई बातको पसद करनेवाले होते हैं, हि देवाः परोक्षप्रियाः इव = देवतालोग मानो परोक्षभावसे कही हुई बातोंको ही पसद करनेवाले होते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम 'इदन्द्र' है। अर्थात् 'इदम्+द्र. = इसको मैंने देख लिया' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उनका 'इदन्द्र' नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम 'इदन्द्र' ही है, फिर भी लोग उन्हें परोक्षभावसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं, क्योकि देवतालोग मानो छिपाकर ही कुछ कहना पसद करते हैं। 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' इस अन्तिम वाक्यको दोबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है ॥ १४ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ ❖ॐ❖

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय सम्बन्ध—प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतरूपसे कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है । अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है— पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतः तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनञ्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥ अयम् = यह (संसारी जीव) ह = निश्चयपूर्वक आदितः = पहले-पहल पुरुषे = पुरुष-शरीरमे वै = ही गर्भः भवति = वीर्यरूपसे गर्भ बनता है यत् = जो एनत् = यह (पुरुषमें) रेतः = वीर्य है तत् = वह एतत् = यह (पुरुषके) सर्वेभ्यः = सम्पूर्ण अङ्गेभ्यः = अङ्गोंसे सम्भूतम् = उत्पन्न हुआ तेजः = तेज है आत्मानम् = ( यह पुरुष पहले तो ) अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यरूप तेजको आत्मनि = अपने शरीरमे एव = ही बिभर्ति = धारण करता है ( फिर ) यदा = जब (यह) तत् = उसको स्त्रियाम् = स्त्रीमे सिञ्चति = सिंचन करता है, अथ = तब एनत् = इसको, जनयति = गर्भरूपमे उत्पन्न करता है तत् = वह अस्य = इसका प्रथमम् = पहला जन्म = जन्म है ॥ १ ॥ व्याख्या—यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमे (पिताके शरीरसे) वीर्यरूपमे गर्भ बनता है—प्रकट होता है । पुरुषके शरीरमे जो यह वीर्य है वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमे ही धारण-पोषण करता है—ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है; फिर जब वह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिंचन (स्थापित) करता है, तब उसे गर्भरूपमे उत्पन्न करता है। वह माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥ तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति । यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । सास्यैतमात्मानमत्र- गतं भावयति ॥ २ ॥ तत् = वह (गर्भ) स्त्रियाः = स्त्रीके आत्मभूतम् = आत्मभावको गच्छति = प्राप्त हो जाता है यथा = जैसे, स्वम् = अपना अङ्गम् = अङ्ग होता है तथा = वैसे ही (हो जाता है), तस्मात् = इसी कारणसे एनाम् = इस स्त्रीको, न हिनस्ति = वह पीड़ा नहीं देता, सा = वह स्त्री (माता), अत्रगतम् = यहाँ (अपने शरीरमें) आये हुए, अस्य = उस ( अपने पति ) के आत्मानम् = आत्मरूप (स्वरूपभूत) एतत् भावयति = इस गर्भका पालन-पोषण करती है ॥ २ ॥ व्याख्या—उस स्त्री (माता) के शरीरमे आया हुआ वह गर्भ—पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है—अर्थात् जैसे उसके दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको पीड़ा नहीं पहुँचाता—उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमे आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है ॥२॥ सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधि- भावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥ सा = वह भावयित्री = उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री. भावयितव्या = पालन-पोषण करनेयोग्य,

३०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको, अग्रे=प्रसवके पहलेतक, स्त्री=स्त्री (माता), बिभर्ति=धारण करती है; जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद, सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले, एव=ही; कुमारम्=उस कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है, सः=वह (पिता); यत्=जो, जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद, अग्रे [एव]=पहले ही, कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता है; तत्=वह, (मानो) एषाम्=इन, लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको), संतत्या=बढ़ानेके द्वारा, आत्मानम् एव भावयति=अपनी ही उन्नति करता है, हि=क्योंकि, एवम्=इसी प्रकार, इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य); संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं, तत्=वह, अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा, जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥ व्याख्या-अपने पतिस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है, फिर जन्म लेनेके बाद--जन्म लेते ही वह उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य न बन जाय, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन पोषण करता है--नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पाद्दिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है, क्योंकि इसी प्रकार एक-से एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है। इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि उसपर अपने माता पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है। और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वर यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है ॥ ३ ॥ सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥ सः=वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ), अयम्=यह, आत्मा=(पिताका ही) आत्मा, अस्य=इस पिताके (द्वारा आचरणीय); पुण्येभ्यः=शुभकर्मोंके लिये; प्रतिधीयते=उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है, अथ=उसके अनन्तर; अस्य=इस (पुत्र) का; अयम्=यह (पितारूप); इतरः=दूसरा, आत्मा=आत्मा; कृतकृत्यः=अपना कर्तव्य पूरा करके; वयोगतः=आयु पूरी होनेपर, प्रैति=(यहाँसे) मरकर चला जाता है, सः=वह; इतः=यहाँसे, प्रयन्=जाकर; एव=ही; पुनः=पुनः; जायते=उत्पन्न हो जाता है, तत्=वह, अस्य=इसका, तृतीयम्=तीसरा, जन्म=जन्म है ॥ ४ ॥ व्याख्या-पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करने योग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है--अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभ कर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् अपनेको पितृ ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है। जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टकी आलोचना करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०९ - सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है, और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझ- कर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा, तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा- यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है- तदुक्तमृषिणा- गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५॥ तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा, उक्तम् = कही गयी है; नु=अहो, अहम् = मैंने, गर्भे = गर्भमें, सन् = रहते हुए ही, एषाम् = इन, देवानाम् = देवताओंके, विश्वा = बहुत से, जनिमानि = जन्मोंको, अन्ववेदम् = भलीभाँति जान लिया, मा= मुझे, शतम् = सैकड़ों, आयसीः = लोहेके समान कठोर, पुरः = शरीरोंने, अरक्षन् = अवरुद्ध कर रक्खा था, अधः = अब (मै), श्येनः = बाज पक्षी (की भाँति), जवसा = वेगसे, निरदीयम् इति = उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ, गर्भे = गर्भमें, एव = हीः शयानः = सोये हुए, वामदेवः = वामदेव ऋषिने; एवम् = उक्त प्रकारसे; एतत् = यह बात, उवाच = कही ॥ ५ ॥ व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था- 'अहो ! कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्त करण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर रक्खा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ ॥ ५ ॥ स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ ६ ॥ एवम् = इस प्रकार, विद्वान् = (जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः = वह वामदेव ऋषि, अस्मात् = इस; शरीरभेदात् = शरीरका नाश होनेपर, ऊर्ध्वः उत्क्रम्य = संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा, अमुष्मिन् = उस, स्वर्गे लोके = परमधाममें (पहुँचकर), सर्वान् = समस्त, कामान् = कामनाओंको, आप्त्वा = प्राप्त करके, अमृतः = अमृत; समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं-इस रहस्यको समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्‌के परमधाममें पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया ! अमृत हो गया ! जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया। 'समभवत्' पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है ॥ ६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥

तृतीय अध्याय

ॐ तृतीय अध्याय कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥ वयम्= हमलोग; उपास्महे = जिसकी उपासना करते हैं, [सः = वह,] अयम् = यह, आत्मा = आत्मा, कः इति = कौन है, वा = अथवा, येन = जिससे, पश्यति = मनुष्य देखता है, वा = या, येन = जिससे, शृणोति = सुनता है, वा = अथवा, येन = जिससे; गन्धान् = गन्धों को, आजिघ्रति = सूँघता है, वा = अथवा, येन = जिससे, वाचम् = वाणी को, व्याकरोति = स्पष्ट बोलता है, वा = या, येन = जिससे, स्वादु = स्वादयुक्त, च = और, अस्वादु = स्वादहीन वस्तु को, च = भी, विजानाति = अलग-अलग जानता है, सः = वह, आत्मा = आत्मा, कतरः = ( पिछले अध्यायोंमे कहे हुए दो आत्माओंमेंसे ) कौन है* ॥ १ ॥ व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा ( परमात्मा ), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वय उसमे प्रविष्ट हुआ, दूसरा वह आत्मा ( जीवात्मा ), जिसको सजीव पुरुषरूपमें उसने प्रकट किया या और जिसके जन्म जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमे आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है । इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है । मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमे विचार करने लगे—'जिसकी हमलोग उपासना करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है ? दूसरे शब्दोंमे जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध सूँघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है, जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त और स्वादहीन वस्तुको अलग अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायोंमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है ? ॥ १ ॥ यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥ यत्=जो, एतत्=यह, हृदयम् = हृदय है, एतत्=यही, मनः = मन, च=भी है, संज्ञानम्=सम्यक् ज्ञान शक्ति, आज्ञानम्= आज्ञा देनेकी शक्ति, विज्ञानम्=विभिन्न रूपसे जाननेकी शक्ति, प्रज्ञानम्=तत्काल जाननेकी शक्ति, मेधा= धारण करनेकी शक्ति, दृष्टिः = देखनेकी शक्ति, धृतिः = धैर्य, मतिः = बुद्धि, मनीषा = मनन शक्ति, जूतिः = वेग, स्मृतिः = स्मरण शक्ति, संकल्पः = सङ्कल्प शक्ति, क्रतुः = मनोरथ शक्ति, असुः = प्राण शक्ति, कामः = कामना शक्ति, वशः = स्त्री ससर्ग आदिकी अभिलाषा, इति = इस प्रकार, एतानि = ये, सर्वाणि = सब के सब, प्रज्ञानस्य = स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके, एव = ही, नामधेयानि = नाम अर्थात् उसकी सत्ताके बोधक लक्षण, भवन्ति = हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक् प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है—अर्थात् जो दूसरोपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे सुने हुए पदार्थोंको तत्काल समझ लेनेकी शक्ति, अनुभवको धारण करनेकी शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात् निश्चय करनेकी शक्ति, मननं करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमे कही-से कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण शक्ति, सङ्कल्प शक्ति, मनोरथ शक्ति, प्राण शक्ति, कामना शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा—इस प्रकार जो ये शक्तियाँ है, वे सब की सब उस स्वच्छ

  • केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है ।
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३११ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं, इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है ॥ २ ॥ एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥ एषः = यह, ब्रह्मा = ब्रह्मा है, एषः = यह; इन्द्रः = इन्द्र है, एषः = यही, प्रजापतिः = प्रजापति है; एते = ये, सर्वे = समस्त, देवाः = देवता, च = तथा, इमानि = ये, पृथिवी = पृथ्वी, वायुः = वायु, आकाशः = आकाश; आपः = जल, और ज्योतींषि = तेज, इति = इस प्रकार; एतानि = ये, पञ्च = पाँच, महाभूतानि = महाभूत, च = तथा, इमानि = ये, क्षुद्रमिश्राणि इव = छोटे-छोटे, मिले हुए से, बीजानि = बीजरूप समस्त प्राणी, च = और, इतराणि = इनसे भिन्न, इतराणि = दूसरे, च = भी, अण्डजानि = अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, च = एव; जारुजानि = जेरसे उत्पन्न होनेवाले, च = तथा, स्वेदजानि = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले, च = और, उद्भिज्जानि = जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले, च = तथा, अश्वाः = घोड़े, गावः = गायें, हस्तिनः = हाथी, पुरुषाः = मनुष्य (ये सब-के-सब मिलकर), यत् = जो, किम् = कुछ, च = भी, इदम् = यह जगत् है, यत् च = जो भी कोई, पतत्रि = पाँखोंवाला, च = और, जङ्गमम् = चलने-फिरनेवाला; च = और, स्थावरम् = नहीं चलनेवाला, प्राणि = प्राणिसमुदाय है, तत् = वह, सर्वम् = सब, प्रज्ञानेत्रम् = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और), प्रज्ञाने = उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही, प्रतिष्ठितम् = स्थित है लोकः = (यह समस्त) ब्रह्माण्ड, प्रज्ञानेत्रः = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान शक्तियुक्त है, प्रज्ञा = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही प्रतिष्ठा = इस स्थितिका आधार है, प्रज्ञानम् = यह प्रज्ञान ही, ब्रह्म = ब्रह्म है ॥ ३ ॥ व्याख्या-इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचो महाभूत-जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं, तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से बीजरूपमे स्थित समस्त प्राणी; तथा उनसे भिन्न दूसरे भी-अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य-ये सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है, जो भी कोई पखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं-वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमे समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामे ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिमे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञान- स्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करने- वाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं-यह निश्चय हुआ ॥ ३ ॥ स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्सम- भवत् ॥ ४ ॥ सः = वह, अस्मात् = इस, लोकात् = लोकसे, उत्क्रम्य = ऊपर उठकर; अमुष्मिन् = उस, स्वर्गे लोके = परम धाममे, एतेन = इस, प्रज्ञेन आत्मना = प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित, सर्वान् = सम्पूर्ण, कामान् = दिव्य भोगोको, आप्त्वा = प्राप्त होकर, अमृतः = अमर, समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ४ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

३१२ • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ व्याख्या—जिसने इस प्रकार प्रज्ञाननरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परमधाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया । ‘समभवत्’ ( हो गया )—इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है ॥ ४ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्ति. ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ उपनिषद्के प्रारम्भमे दिया जा चुका है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ तैत्तिरीयोपनिषद् यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाके अन्तर्गत तैत्तिरीय आरण्यकका अङ्ग है । तैत्तिरीय आरण्यकके दस अध्याय हैं । उनमेंसे सातवें, आठवें और नवें अध्यायोंको ही तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है । शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ आगे प्रथम अनुवाकमे दिया गया है । शिक्षा-वल्ली* प्रथम अनुवाक ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ॐ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है । नः=हमारे लिये, मित्रः=( दिन और प्राणके अधिष्ठाता ) मित्र देवता, शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों ( तथा ), वरुणः=( रात्रि और अपानके अधिष्ठाता ) वरुण ( भी ), शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों, अर्यमा= ( चक्षु और सूर्य-मण्डलके अधिष्ठाता ) अर्यमा, नः=हमारे लिये, शम् भवतु=कल्याणकारी हों, इन्द्रः=( बल और भुजाओंके अधिष्ठाता ) इन्द्र (तथा), बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति, नः=(दोनों) हमारे लिये, शम् [भवताम्]= शान्ति प्रदान करनेवाले हों, उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले, विष्णुः=विष्णु ( जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं ), नः= हमारे लिये, शम् [ भवतु ]=कल्याणकारी हों, ब्रह्मणे=( उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप ) ब्रह्मके लिये, नमः= नमस्कार है, वायो=हे वायुदेव, ते=तुम्हारे लिये, नमः=नमस्कार है, त्वम्=तुम, एव=ही, प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष ( प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले ), ब्रह्म=ब्रह्म; असि=हो, (इसलिये मैं) त्वाम्=तुमको, एव=ही, प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष, ब्रह्म=ब्रह्म, वदिष्यामि=

  • इस प्रकरणमें दी हुई शिक्षाके अनुसार अपना जीवन बना लेनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोकके सर्वोत्तम फलको पा सकता है और ब्रह्मविद्याको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है—इस भावको समझानेके लिये इस प्रकरणका नाम शिक्षावल्ली रक्खा गया है ।

३१४ -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- कहूँगा, ऋतम्= ( तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैं तुम्हे ) ऋत नामसे, वदिष्यामि=पुकारूँगा, सत्यम्= ( तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैं तुम्हें) सत्य नामसे, वदिष्यामि= कहूँगा तत्=वह (सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ), माम् अवतु= मेरी रक्षा करे, तत्=वह; वक्तारम् अवतु = वक्ताकी अर्थात् आचार्यकी रक्षा करे, अवतु माम्=रक्षा करे मेरी, (और) अवतु वक्तारम्=रक्षा करे मेरे आचार्यकी, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः = भगवान् शान्तिस्वरूप है, शान्तिस्वरूप हे शान्तिस्वरूप हे । व्याख्या - इस प्रथम अनुवाकमे भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थना की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा -अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों । हमारी उन्नतिके मार्गमें और अपनी प्राप्तिके मार्गमे किसी प्रकारका विघ्न न आने दे । हम सबके अन्तर्यामी उन ब्रह्मको नमस्कार करते हैं । इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमे समस्त प्राणियोमे व्याप्त उन परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं- हे सर्वशक्तिमान् सबके प्राणस्वरूप वायुमन परमेश्वर ! तुम्हे नमस्कार है । तुम्हीं समस्त प्राणियोके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, अतः मैं तुम्हींको प्रत्यक्ष ब्रह्मके नामसे पुकारूँगा । मे 'ऋत' नामसे भी तुम्हे पुकारूँगा, क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके तुम्हीं अधिष्ठाता हो । तथा मैं तुम्हे 'सत्य' नामसे पुकारा करूँगा, क्योकि सत्य ( यथार्थ भाषण) के अधिष्ठातृ-देवता तुम्हीं हो । वे सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर मुझे सत् आचरण एवं सत्य- भाषण करनेकी और मृत-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप ससार चक्रसे मेरी रक्षा करें, तथा मेरे आचार्यको इन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा करें। यहाँ 'मेरी रक्षा करें', 'वक्ताकी रक्षा करें'-इन वाक्योको दुबारा कहनेका अभिप्राय शान्तिपाठकी समाप्तिको सूचित करना है । ओम् शान्ति, शान्ति, शान्ति - इस प्रकार तीन बार कहनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय । भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है । ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः । शीक्षाम् व्याख्यास्यामः = अब हम शिक्षाका वर्णन करेंगे, वर्णः = वर्ण, स्वरः = स्वर मात्राः = मात्रा, बलम् = प्रयत्न, साम = वर्णोंका सम वृत्तिसे उच्चारण अथवा गान करनेकी रीति, (और) संतानः = संधि इति = इस प्रकार, शीक्षाध्यायः = वेदके उच्चारणकी शिक्षारूप अध्याय, उक्तः = कहा गया । व्याख्या-इस मन्त्रमें वेदके उच्चारणके नियमोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संकेतमात्र किया गया है । इससे मालूम होता है कि उस समय जो शिष्य परमात्माकी रहस्य-विद्याका जिज्ञासु होता था, वह इन नियमोंको पहलेसे ही पूर्णतया जाननेवाला होता था, अतः उसे सावधान करनेके लिये संकेतमात्र ही यथेष्ट था । इन संकेतोंका भाव यह प्रतीत होता है कि मनुष्योंको वैसे तो प्रत्येक शब्दके उच्चारणमें सावधानी बरतते हुए शुद्ध बोलनेका अभ्यास रखना चाहिये । पर यदि लौकिक शब्दोंमें नियमोंका पालन नहीं भी किया जा सके तो कम-से-कम वेदमन्त्रोंका उच्चारण तो अवश्य ही शिक्षाके नियमानुसार होना चाहिये । क, ख आदि व्यञ्जन वर्णों और अ, आ आदि स्वर वर्णोंका स्पष्ट उच्चारण करना चाहिये । दन्त्य 'स' के स्थानमें तालव्य 'श' या मूर्धन्य 'ष' का उच्चारण नहीं करना चाहिये । 'ब' के स्थानमें 'व' का उच्चारण नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार अन्य वर्णोंके उच्चारणमें भी विशेष ध्यान रखना चाहिये । इसी प्रकार बोलते समय किस वर्णका किस

यहाँ दिए गए पृष्ठ का पाठ प्रस्तुत है:

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१५

जगह क्या भाव प्रकट करनेके लिये उच्च स्वरसे उच्चारण करना उचित है, किसका मध्य स्वरसे और किसका निम्न स्वरमे उच्चारण करना उचित है—इस बातका भी पूरा-पूरा ध्यान रखकर यथोचित स्वरसे बोलना चाहिये। वेदमन्त्रोंके उच्चारणमें उदात्त आदि स्वरोंका ध्यान रखना और कहाँ कौन स्वर है—इसका यथार्थ ज्ञान होना विशेष आवश्यक है, क्योंकि मन्त्रोंमें स्वरभेद होनेसे उनका अर्थ बदल जाता है तथा अशुद्ध स्वरका उच्चारण करनेवालेको अनिष्टका भागी होना पड़ता है।* ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इस प्रकार मात्राओंके भेदोंको भी समझकर यथायोग्य उच्चारण करना चाहिये, क्योंकि ह्रस्वके स्थानमे दीर्घ और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व उच्चारण करनेमें अर्थका बहुत अन्तर हो जाता है—जैसे 'सिता और सीता'। बलका अर्थ है प्रयत्न। वर्णोंके उच्चारणमें उनकी ध्वनिको व्यक्त करनेमें जो प्रयास करना पड़ता है, वही प्रयत्न कहलाता है। प्रयत्न दो प्रकारके होते हैं—आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तरके पाँच और बाह्यके ग्यारह भेद माने गये हैं। स्पृष्ट, ईषत् स्पृष्ट, विवृत, ईषद् विवृत, संवृत—ये आभ्यन्तर प्रयत्न हैं। विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—ये बाह्य प्रयत्न हैं। उदाहरणके लिये 'क'से लेकर 'म'तकके अक्षरोंका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट है, क्योंकि कण्ठ आदि स्थानोंमें प्राणवायुके स्पर्शसे इनका उच्चारण होता है। 'क'का बाह्य प्रयत्न विवार, श्वास, अघोष तथा अल्पप्राण है—इस विषयका विशद ज्ञान प्राप्त करनेके लिये व्याकरण देखना चाहिये। वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण या साम गानकी रीति ही साम है। इसका भी ज्ञान और तदनुसार उच्चारण आवश्यक है। सन्तानका अर्थ है सहिता—संधि। स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग अथवा अनुस्वार आदि अपने परवर्ती वर्णके संयोगसे कहीं-कहीं नूतन रूप धारण कर लेते हैं, इस प्रकार वर्णोंका यह संयोजनजनित विकृतिभाव—'संधि' कहलाता है। किसी विशेष स्थलमें जहाँ संधि बाधित होती है, वहाँ वर्णमें विकार नहीं आता, अतः उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि वर्णोंके उच्चारणमे उक्त छहों नियमोंका पालन आवश्यक है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक सम्बन्ध—अब आचार्य अपने और शिष्यके अभ्युदयकी इच्छा प्रकट करते हुए सहिताविषयक उपासनाविधि आरम्भ करते हैं—

सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः स५हिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधि- करणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महास५हिता इत्याचक्षते । अथाधि- लोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः । वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् ।

नौ=हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंका, यशः=यश, सह=एक साथ बढे (तथा), सह=एक साथ ही, नौ=हम दोनोंका, ब्रह्मवर्चसम्=ब्रह्म-तेज भी बढे, अथ=इस प्रकार शुभ इच्छा प्रकट करनेके अनन्तर, अतः=यहाँसे, (हम) अधिलोकम्=लोकोंके विषयमे, अधिज्यौतिषम्=ज्योतियोके विषयमे, अधिविद्यम्=विद्याके विषयमे, अधिप्रजम्=प्रजाके विषयमें, (और) अध्यात्मम्=शरीरके विषयमे, (इस तरह) पञ्चसु=पाँच, अधिकरणेषु=स्थानोंमें, संहितायाः=सहिताके, उपनिषदम् व्याख्यास्यामः=रहस्यका वर्णन करेंगे, ताः=इन सब को, महासंहिताः=महासंहिता, इति=इस नामसे, आचक्षते=कहते हैं, अथ=उनमेसे (यह पहली), अधिलोकम्=लोकविषयक सहिता है, पृथिवी=पृथ्वी, पूर्वरूपम्= पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, द्यौः=स्वर्गलोक, उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है, आकाशः=आकाश, संधिः=संधि—मेलसे

  • महर्षि पतञ्जलिने महाभाष्यमें कहा है— दुष्ट शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ अर्थात् स्वर या वर्णकी अशुद्धिसे दूषित शब्द ठीक-ठाक प्रयोग न होनेके कारण अभीष्ट अर्थका वाचक नहीं होता। इतना ही नहीं, वह वचनरूपी वज्र यजमानको हानि भी पहुँचाता है। जैसे 'इन्द्रशत्रु' शब्दमें स्वरकी अशुद्धि हो जानेके कारण 'वृत्रासुर' स्वयं ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।

बना हुआ रूप, ( तथा ) वायुः = वायु, संधानम् = दोनोंका संयोजक है; इति = इस प्रकार; ( यह ) अधिलोकम् = लोकविषयक संहिताकी उपासनाविधि पूरी हुई । व्याख्या - इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है । आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते है । वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'मंहिता' कहते हे । वही सरिता दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते ह । सहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है । स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार-ये ही संधि के अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं- लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर) । तात्पर्य यह कि जैसे वर्गोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये । वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है । प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं- पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम । इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें सहिता दृष्टि की जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे- पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान ( संयोजक ) । इस मन्त्रमें लोकविषयक सहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथिवीको देखना चाहिये । इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप ( परवर्ण ) है । आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका सधान ( संयोजक ) है । जैसे पूर्व और उत्तर वर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलाया जाता है ( सम्बद्ध किया जाता है ) - यह भाव हो सकता है । यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है, क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है, परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस सकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौनसे लोककी प्राप्ति की जा सकती है । इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमे प्राणोंकी प्रधानता है । प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है- यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है, किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथिवी पहला वर्ण है और द्युलोक दूसरा वर्ण है एव आकाश संधि (इनका सयुक्त रूप) है-इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक ठीक समझमें नहीं आता । अथाधिज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथ = अथ, अधिज्यौतिषम् = ज्योतिविषयक सहिताका वर्णन करते हैं, अग्निः = अग्नि, पूर्वरूपम् = पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, आदित्यः = सूर्य, उत्तररूपम् = उत्तररूप (परवर्ण) है, आपः = जल-मेघ, संधिः = इन दोनोंकी संधि-मेलसे बना हुआ रूप है, ( और ) वैद्युतः = बिजली, ( इनका ) संधानम् = सधान ( जोड़नेका हेतु ) है, इति = इस प्रकार; अधिज्यौतिषम् = ज्योतिविषयक संहिता कही गयी। व्याख्या- अग्नि इस भूतलपर सुलभ है, अतः उसे सहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है, और सूर्य द्युलोकमें- ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है । इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत् शक्ति ही इस संधिकी हेतु ( सधान ) बतायी गयी है। इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक सहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदाथ.को जलका नाम दियागया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको कारण बताया गया है, ऐसा अनुमान होता है, क्योंकि आजकलके वैज्ञानिकों-

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१७ ने भी बिजलीसे नाना प्रकारके भौतिक विकास करके दिखाये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेदमे यह भौतिक उन्नतिका साधन भी भलीभाँति बताया गया है, परंतु परम्परानष्ट हो जानेके कारण उसको समझने और समझानेवाले दुर्लभ हो गये हैं। अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳसंधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथ = अब, अधिविद्यम् = विद्याविषयक सहिताका आरम्भ करते हैं, आचार्यः = गुरु, पूर्वरूपम् = पहला वर्ण है; अन्तेवासी = समीप निवास करनेवाला शिष्य, उत्तररूपम् = दूसरा वर्ण है, विद्या = ( दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न ) विद्या; संधिः = मिला हुआ रूप हे, प्रवचनम् = गुरुद्वारा दिया हुआ उपदेश ही, संधानम् = संधिका हेतु है, इति = इस प्रकार ( यह ); अधिविद्यम् = विद्याविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें विद्याके विषयमे सहिता-दृष्टिका उपदेश दिया गया है। इसके द्वारा विद्याप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह हे कि जिस प्रकार वर्णोंकी संधिमे एक पूर्ववर्ण और एक परवर्ण होता है, उसी प्रकार यहाँ विद्या- रूप संहितामें गुरु तो मानो पूर्ववर्ण है और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा करनेवाला विद्याभिलाषी शिष्य परवर्ण है, तथा संधिमें दो वर्णोंके मिलनेपर जैसे एक तीसरा नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार गुरु और शिष्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होने- वाली विद्या—ज्ञान ही यहाँ संधि है। इस विद्यारूप संघिके प्रकट होनेका कारण है—प्रवचन अर्थात् गुरुका उपदेश देना और शिष्यद्वारा उसको श्रद्धापूर्वक सुन समझकर वारण करना, यही सधान है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर विद्वान् गुरुकी सेवा करता है, वह अवश्य ही विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाता है। अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजासंधिः । प्रजननꣳसंधानम् । इत्यधिप्रजम् । अथ = अव; अधिप्रजम् = प्रजाविषयक सहिता कहते है, माता = माता, पूर्वरूपम् = पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, पिता = पिता, उत्तररूपम् = उत्तररूप (परवर्ण) है, प्रजा = (उन दोनोंके मेलसे उत्पन्न) सतान, संधिः = संधि है, (तथा) प्रजननम् = प्रजनन (सतानोत्पत्तिके अनुकूल व्यापार), संधानम् = सधान (संधिका कारण) है, इति = इस प्रकार (यह), अधिप्रजम् = प्रजाविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें सहिताके रूपमे प्रजाका वर्णन करके सतानप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि इस प्रजा-विषयक संहितामें माता तो मानो पूर्ववर्ण है और पिता परवर्ण है। जिस प्रकार दोनों वर्णोंकी संधिसे एक नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार माता-पिताके सयोगसे उत्पन्न होनेवाली सतान ही इस सहितामे दोनोंकी संधि ( सयुक्त स्वरूप ) है। तथा माता और पिताका जो ऋतुकालमे शास्त्रविधिके अनुसार यथोचित नियमपूर्वक सतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे सहवास करना है, यही सधान (पुत्रोत्पत्तिका कारण) है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर सतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकालमें धर्मयुक्त स्त्रीसहवास करता है, वह अवश्य ही अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ सतान प्राप्त कर लेता है। अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्यध्यात्मम् । अथ = अब, अध्यात्मम् = आत्मविषयक महिताका वर्णन करते हैं, अधरा हनुः = नीचेका जबड़ा, पूर्वरूपम् = पूर्व रूप (वर्ण) है, उत्तरा हनुः = ऊपरका जबड़ा, उत्तररूपम् = दूसरा रूप (वर्ण) है, वाक् = (दोनोके मिलनेसे उत्पन्न) वाणी, संधिः = सधि है, (और) जिह्वा = जिह्वा, संधानम् = सधान (वाणीरूप सधिकी उत्पत्तिका कारण) है, इति = इस प्रकार (यह); अध्यात्मम् = आत्मविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें शरीर-विषयक सहिता दृष्टिका उपदेश किया गया है। शरीरमे प्रधान अङ्ग मुख है, अतः मुखके ही अवयवोंमे संहिताका विभाग दिखाया गया है। तात्पर्य यह कि नीचेका जबड़ा मानो सहिताका पूर्ववर्ण है, ऊपरका जबड़ा परवर्ण है, इन दोनोंके सयोगसे इनके मध्यभागमें अभिव्यक्त होनेवाली वाणी ही संधि है और जिह्वा ही सधान (वाणी- रूप संघिके प्रकट होनेका कारण) है, क्योंकि जिह्वाके बिना मनुष्य कोई भी शब्द नहीं बोल सकता। वाणीमें विलक्षण शक्ति

३१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है । वाणीद्वारा प्रार्थना करके मनुष्य शरीरके पोषण और उसे उन्नत करनेकी सभी सामग्री प्राप्त कर सकता है । तथा ओङ्कार- रूप परमेश्वरके नाम जपसे परमात्माको भी प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार वाणीमे शारीरिक और आत्मविषयक-दोनों तरह- की उन्नति करनेकी सामर्थ्य भरी हुई है । इस रहस्यको समझकर जो मनुष्य अपनी वाणीका यथायोग्य उपयोग करता है, वह वाक्शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन । इति = इस प्रकार, इमाः = ये, महासंहिताः = पाँच महासंहिताएँ कही गयी ह, यः = जो मनुष्य, एवम् = इस प्रकार; एताः = इन; व्याख्याताः = ऊपर बतायी हुई, महासंहिताः = महासंहिताओंको, वेद = जान लेता है; (वह) प्रजया = सन्तानसे, पशुभिः = पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, अन्नाद्येन = अन्न आदि भोग्य पदार्थोसे (और) सुवर्गेण = स्वर्गरूप; लोकेन = लोकसे, संधीयते = सम्पन्न हो जाता है । व्याख्या - इस मन्त्रमें पाँच प्रकारसे कही हुई महासंहिताओंके यथार्थ ज्ञानका फल बताया गया है । इनको जानने- वाला अपनी इच्छाके अनुकूल संतान प्राप्त कर सकता है, विद्याके द्वारा ब्रह्मतेज सम्पन्न हो जाता है, अपनी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके पशुओंको और अन्न आदि आवश्यक भोग्य पदार्थोंको प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी हो जाती है । इनमेंसे लोकविषयक सहिताके ज्ञानसे स्वर्ग आदि उत्तम लोक, ज्योति-विषयक सहिताके ज्ञानसे नाना प्रकारकी भौतिक सामग्री, प्रजाविषयक संधिके ज्ञानसे संतान, विद्याविषयक सहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्म- सहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति-इस प्रकार पृथक् पृथक् फल समझना चाहिये । श्रुतिमे समस्त संहिताओंके ज्ञानका सामूहिक फल बताया गया है । श्रुति ईश्वरकी वाणी है, अतः इसका रहस्य समझकर श्रद्धा और विश्वासके साथ उपर्युक्त उपासना करनेसे निस्सन्देह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है । ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । यः = जो, छन्दसाम् = वेदोंमें, ऋषभः = सर्वश्रेष्ठ है, विश्वरूपः = सर्वरूप है, (और) अमृतात् = अमृतरूप, छन्दोभ्यः = वेदोंसे, अधि = प्रधानरूपसे, सम्बभूव = प्रकट हुआ है, सः = वह (ओङ्कारस्वरूप) इन्द्रः = सबका स्वामी (परमेश्वर), मा = मुझे, मेधया = धारणाद्युक्त बुद्धिसे, स्पृणोतु = सम्पन्न करे देव = हे देव, (मैं आपकी कृपासे) अमृतस्य धारणः = अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला, भूयासम् = बन जाऊँ, मे = मेरा; शरीरम् = शरीर, विचर्षणम् = विशेष फुर्तीला-सब प्रकारसे रोगरहित हो, (और) मे = मेरी, जिह्वा = जिह्वा, मधुमत्तमा = अतिशय मधुमती (मधुरभाषिणी), [भूयात् = हो जाय,] कर्णाभ्याम् = (मैं) दोनों कानोंद्वारा, भूरि = अधिक, विश्रुवम् = सुनता रहूँ, (हे प्रणव ! तू) मेधया = लौकिक बुद्धिसे, पिहितः = ढकी हुई, ब्रह्मणः = परमात्माकी, कोशः = निधि, असि = है, (तू) मे = मेरे, श्रुतम् गोपाय = सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर । व्याख्या - इस चतुर्थ अनुवाकमें 'मे श्रुतम् गोपाय' इस वाक्यतक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये आवश्यक

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१९ बुद्धिबल और शारीरिक बलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे परमेश्वरसे उनके नाम ओंकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि 'ओम्' यह परमेश्वरका नाम वेदोक्त जितने भी मन्त्र हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है और सर्वरूप है, क्योंकि प्रत्येक मन्त्रके आदिमे ओंकारका उच्चारण किया जाता है और ओंकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण वेदोंके उच्चारणका फल प्राप्त होता है। तथा अविनाशी वेदोंसे यह ओंकार प्रधानरूपमे प्रकट हुआ है। ओंकार नाम है और परमेश्वर नामी, अतः दोनों परस्पर अभिन्न है। वे प्रणवरूप परमात्मा सबके परमेश्वर होनेके कारण 'इन्द्र' नामसे प्रसिद्ध है। वे इन्द्र मुझे मेधासे सम्पन्न करें। 'धीर्धारणावती मेधा' इस कोषवाक्यके अनुसार धारणाशक्तिसे सम्पन्न बुद्धिका नाम मेधा है। तात्पर्य यह कि परमात्मा मुझे पढे और समझे हुए भावोंको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न करे। हे देव ! मै आपकी अहैतुकी कृपासे आपके अमृतमय स्वरूपको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर रोगरहित रहे, जिससे आपकी उपासनामें किसी प्रकारका विघ्न न पड़े। मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती अर्थात् मधुर स्वरसे आपके अत्यन्त मधुर नाम और गुणोंका कीर्तन करके उनके मधुर रसका आस्वादन करनेवाली बन जाय। मै अपने दोनों कानोंद्वारा कल्याणमय बहुतसे शब्दोंको सुनता रहूँ, अर्थात् मेरे कानोंमें आचार्यद्वारा वर्णन किये हुए रहस्यको पूर्णतया सुननेकी शक्ति आ जाय और मुझे आपका कल्याणमय यश सुननेको मिलता रहे। हे ओंकार ! तू परमेश्वरकी निधि है, अर्थात् वे पूर्णब्रह्म परमेश्वर तुझमे भरे हुए हैं, क्योंकि नामी नामके ही आश्रित रहता है। ऐसा होते हुए भी तू मनुष्योंकी लौकिक बुद्धिसे ढका हुआ है-लौकिक तर्कसे अनुसन्धान करनेवालोंकी बुद्धिमे तेरा प्रभाव व्यक्त नहीं होता। हे देव ! तू सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर अर्थात् ऐसी कृपा कर कि मुझे जो उपदेश सुननेको मिले, उसे मैं स्मरण रखता हुआ उसके अनुसार अपना जीवन बना सकूँ। सम्बन्ध-अब ऐश्वर्यकी कामनावालेके लिये हवन करनेके मन्त्रोंका आरम्भ करते है— आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासांसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा । ततः = उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव !), [या श्रीः = जो श्री,] मम = मेरे, आत्मनः = अपने लिये, अचीरम् = तत्काल ही, वासांसि = नाना प्रकारके वस्त्र, च = और, गावः = गौएँ, च = तथा, अन्नपाने = खाने-पीनेके पदार्थ, सर्वदा = सदैव, आवहन्ती = ला देनेवाली, वितन्वाना = उनका विस्तार करनेवाली, [च = तथा,] कुर्वाणा = उन्हें बनानेवाली है, लोमशाम् = रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि पशुओसे युक्त, पशुभिः सह = (तथा अन्य) पशुओंके सहित; [ताम्] श्रियम् = उस श्रीको, मे = (तू) मेरे लिये, आवह = ले आ, स्वाहा = स्वाहा (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)। व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अङ्गमें 'ततः' पदसे लेकर 'आवह स्वाहा' यहाँतक ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर ! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एव अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका साधनरूप धन मुझे प्रदान कर। इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमे आहुति देनी चाहिये, ˗ यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है। सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है— आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, मा = मेरे पास; आयन्तु = आयें, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति दी

३२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जाती है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, विमायन्तु = कपटशून्य हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, प्रमायन्तु = प्रामाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हो, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, दमयन्तु = इन्द्रियोका दमन करनेवाले हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग. शमायन्तु = मनको वशमे करनेवाले हों; स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)। व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे शिष्योके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढनेके लिये आये' इस उद्देश्यने मन्त्र पढकर 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे, 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढकर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हो' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमे करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति दे। सम्बन्ध—आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये जिस प्रकार हवन करना चाहिये, उसकी विधि बतायी जाती है-- यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे नि भगाहं त्वयि मृजे स्वाहा। जने = लोगोंमें (मै), यशः = यशस्वी, असानि = होऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः = महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी, श्रेयान् = अधिक धनवान्; असानि = हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), भग = हे भगवन्, तम् त्वा = उस आपमें, प्रविशानि = मै प्रविष्ट हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), भग = हे भगवन्!, सः = वह (तू); मा = मुझमें, प्रविश = प्रविष्ट हो जा, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यमे यह आहुति है), भग = हे भगवन्!, तस्मिन् = उस, सहस्रशाखे = हजारो शाखावाले; त्वयि = आपमे, (ध्यानद्वारा निमग्न होकर) अहम् = मै, निमृजे = अपनेको विशुद्ध कर लूँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)। व्याख्या-चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्यको 'लोगोंमें मै यशस्वी बनूँ, जगत्में मेरा यश सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो' इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमे डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय-मेरे मनमे बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन् ! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमे ध्यानद्वारा निमग्न होकर मै अपने आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमे डालनी चाहिये। यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ यथा = जिस प्रकार, आपः = (नदी आदिके) जल, प्रवता = निम्न स्थानसे होकर; यन्ति = समुद्रमें चले जाते हैं, यथा = जिस प्रकार, मासाः = महीने, अहर्जरम् = दिनोंका अन्त करनेवाले सम्वत्सररूप कालमे, [यन्ति = चले जाते हैं,]

धातः = हे विधाता; एवम् = इसी प्रकार; माम् = मेरे पास; सर्वतः = सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु = आयें; स्वाहा = स्वाहा ( इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः = (तू) सबका विश्राम-स्थान; असि = है; मा = मेरे लिये; प्रभाहि = अपनेको प्रकाशित कर; मा = मुझे; प्रपद्यस्व = प्राप्त हो जा। व्याख्या - 'जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं, तथा जिस प्रकार महीने दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता ! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ छठी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये । 'हे परमात्मन् ! आप सबके विश्राम- स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्निमें डाले। इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये । ॥ चतुर्थ अनुवाक ॥ ४ ॥ पञ्चम अनुवाक भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते । भूः = भूः; भुवः = भुवः; सुवः = स्वः; इति = इस प्रकार; एताः = ये; वै = प्रसिद्ध; तिस्रः = तीन; व्याहृतयः = व्याहृतियाँ हैं; तासाम् उ = उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम् = जो चौथी व्याहृति; महः इति = 'मह' इस नामसे, ह = प्रसिद्ध है; एताम् = इसको; माहाचमस्यः = महाचमसके पुत्रने, प्रवेदयते स्म = सबसे पहले जाना था, तत् = वह चौथी व्याहृति ही; ब्रह्म = ब्रह्म है; सः = वह; आत्मा = ऊपर कही हुई व्याहृतियोंकी आत्मा है; अन्याः = अन्य; देवताः = सब देवता; अङ्गानि = उसके अङ्ग हैं, भूः = 'भूः'; इति = यह व्याहृति; वै = ही; अयम् लोकः = यह पृथ्वी-लोक है, भुवः = 'भुवः'; इति = यह; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः = 'स्वः'; इति = यह, असौ लोकः = वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है; महः = 'महः'; इति = यह, आदित्यः = आदित्य-सूर्य है; आदित्येन = (क्योंकि) आदित्यसे; वाव = ही; सर्वे = समस्त; लोकाः = लोक, महीयन्ते = महिमान्वित होते हैं। व्याख्या - इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः - इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ तो प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहृति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले महाचमसके पुत्रने जाना था । भाव यह है कि इन चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहृतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहृतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहृति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः' व्याहृतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये - यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहृति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं, अतः जिस किसी भी देवताकी इन व्याहृतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है। उ० अं० ४१-४२-