कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ द्वितीय अध्याय सम्बन्ध—प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतरूपसे कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है । अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है— पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतः तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनञ्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥ अयम् = यह (संसारी जीव) ह = निश्चयपूर्वक आदितः = पहले-पहल पुरुषे = पुरुष-शरीरमे वै = ही गर्भः भवति = वीर्यरूपसे गर्भ बनता है यत् = जो एनत् = यह (पुरुषमें) रेतः = वीर्य है तत् = वह एतत् = यह (पुरुषके) सर्वेभ्यः = सम्पूर्ण अङ्गेभ्यः = अङ्गोंसे सम्भूतम् = उत्पन्न हुआ तेजः = तेज है आत्मानम् = ( यह पुरुष पहले तो ) अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यरूप तेजको आत्मनि = अपने शरीरमे एव = ही बिभर्ति = धारण करता है ( फिर ) यदा = जब (यह) तत् = उसको स्त्रियाम् = स्त्रीमे सिञ्चति = सिंचन करता है, अथ = तब एनत् = इसको, जनयति = गर्भरूपमे उत्पन्न करता है तत् = वह अस्य = इसका प्रथमम् = पहला जन्म = जन्म है ॥ १ ॥ व्याख्या—यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमे (पिताके शरीरसे) वीर्यरूपमे गर्भ बनता है—प्रकट होता है । पुरुषके शरीरमे जो यह वीर्य है वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमे ही धारण-पोषण करता है—ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है; फिर जब वह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिंचन (स्थापित) करता है, तब उसे गर्भरूपमे उत्पन्न करता है। वह माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥ तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति । यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । सास्यैतमात्मानमत्र- गतं भावयति ॥ २ ॥ तत् = वह (गर्भ) स्त्रियाः = स्त्रीके आत्मभूतम् = आत्मभावको गच्छति = प्राप्त हो जाता है यथा = जैसे, स्वम् = अपना अङ्गम् = अङ्ग होता है तथा = वैसे ही (हो जाता है), तस्मात् = इसी कारणसे एनाम् = इस स्त्रीको, न हिनस्ति = वह पीड़ा नहीं देता, सा = वह स्त्री (माता), अत्रगतम् = यहाँ (अपने शरीरमें) आये हुए, अस्य = उस ( अपने पति ) के आत्मानम् = आत्मरूप (स्वरूपभूत) एतत् भावयति = इस गर्भका पालन-पोषण करती है ॥ २ ॥ व्याख्या—उस स्त्री (माता) के शरीरमे आया हुआ वह गर्भ—पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है—अर्थात् जैसे उसके दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको पीड़ा नहीं पहुँचाता—उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमे आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है ॥२॥ सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधि- भावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥ सा = वह भावयित्री = उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री. भावयितव्या = पालन-पोषण करनेयोग्य,