भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 832 में से

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पृष्ठ 334

३०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको, अग्रे=प्रसवके पहलेतक, स्त्री=स्त्री (माता), बिभर्ति=धारण करती है; जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद, सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले, एव=ही; कुमारम्=उस कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है, सः=वह (पिता); यत्=जो, जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद, अग्रे [एव]=पहले ही, कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता है; तत्=वह, (मानो) एषाम्=इन, लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको), संतत्या=बढ़ानेके द्वारा, आत्मानम् एव भावयति=अपनी ही उन्नति करता है, हि=क्योंकि, एवम्=इसी प्रकार, इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य); संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं, तत्=वह, अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा, जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥ व्याख्या-अपने पतिस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है, फिर जन्म लेनेके बाद--जन्म लेते ही वह उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य न बन जाय, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन पोषण करता है--नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पाद्दिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है, क्योंकि इसी प्रकार एक-से एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है। इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि उसपर अपने माता पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है। और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वर यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है ॥ ३ ॥ सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥ सः=वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ), अयम्=यह, आत्मा=(पिताका ही) आत्मा, अस्य=इस पिताके (द्वारा आचरणीय); पुण्येभ्यः=शुभकर्मोंके लिये; प्रतिधीयते=उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है, अथ=उसके अनन्तर; अस्य=इस (पुत्र) का; अयम्=यह (पितारूप); इतरः=दूसरा, आत्मा=आत्मा; कृतकृत्यः=अपना कर्तव्य पूरा करके; वयोगतः=आयु पूरी होनेपर, प्रैति=(यहाँसे) मरकर चला जाता है, सः=वह; इतः=यहाँसे, प्रयन्=जाकर; एव=ही; पुनः=पुनः; जायते=उत्पन्न हो जाता है, तत्=वह, अस्य=इसका, तृतीयम्=तीसरा, जन्म=जन्म है ॥ ४ ॥ व्याख्या-पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करने योग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है--अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभ कर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् अपनेको पितृ ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है। जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टकी आलोचना करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

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