भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०९ - सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है, और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझ- कर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा, तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा- यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है- तदुक्तमृषिणा- गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५॥ तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा, उक्तम् = कही गयी है; नु=अहो, अहम् = मैंने, गर्भे = गर्भमें, सन् = रहते हुए ही, एषाम् = इन, देवानाम् = देवताओंके, विश्वा = बहुत से, जनिमानि = जन्मोंको, अन्ववेदम् = भलीभाँति जान लिया, मा= मुझे, शतम् = सैकड़ों, आयसीः = लोहेके समान कठोर, पुरः = शरीरोंने, अरक्षन् = अवरुद्ध कर रक्खा था, अधः = अब (मै), श्येनः = बाज पक्षी (की भाँति), जवसा = वेगसे, निरदीयम् इति = उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ, गर्भे = गर्भमें, एव = हीः शयानः = सोये हुए, वामदेवः = वामदेव ऋषिने; एवम् = उक्त प्रकारसे; एतत् = यह बात, उवाच = कही ॥ ५ ॥ व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था- 'अहो ! कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्त करण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर रक्खा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ ॥ ५ ॥ स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ ६ ॥ एवम् = इस प्रकार, विद्वान् = (जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः = वह वामदेव ऋषि, अस्मात् = इस; शरीरभेदात् = शरीरका नाश होनेपर, ऊर्ध्वः उत्क्रम्य = संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा, अमुष्मिन् = उस, स्वर्गे लोके = परमधाममें (पहुँचकर), सर्वान् = समस्त, कामान् = कामनाओंको, आप्त्वा = प्राप्त करके, अमृतः = अमृत; समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं-इस रहस्यको समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्‌के परमधाममें पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया ! अमृत हो गया ! जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया। 'समभवत्' पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है ॥ ६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥