भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 832 में से

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पृष्ठ 336

ॐ तृतीय अध्याय कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥ वयम्= हमलोग; उपास्महे = जिसकी उपासना करते हैं, [सः = वह,] अयम् = यह, आत्मा = आत्मा, कः इति = कौन है, वा = अथवा, येन = जिससे, पश्यति = मनुष्य देखता है, वा = या, येन = जिससे, शृणोति = सुनता है, वा = अथवा, येन = जिससे; गन्धान् = गन्धों को, आजिघ्रति = सूँघता है, वा = अथवा, येन = जिससे, वाचम् = वाणी को, व्याकरोति = स्पष्ट बोलता है, वा = या, येन = जिससे, स्वादु = स्वादयुक्त, च = और, अस्वादु = स्वादहीन वस्तु को, च = भी, विजानाति = अलग-अलग जानता है, सः = वह, आत्मा = आत्मा, कतरः = ( पिछले अध्यायोंमे कहे हुए दो आत्माओंमेंसे ) कौन है* ॥ १ ॥ व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा ( परमात्मा ), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वय उसमे प्रविष्ट हुआ, दूसरा वह आत्मा ( जीवात्मा ), जिसको सजीव पुरुषरूपमें उसने प्रकट किया या और जिसके जन्म जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमे आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है । इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है । मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमे विचार करने लगे—'जिसकी हमलोग उपासना करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है ? दूसरे शब्दोंमे जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध सूँघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है, जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त और स्वादहीन वस्तुको अलग अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायोंमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है ? ॥ १ ॥ यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥ यत्=जो, एतत्=यह, हृदयम् = हृदय है, एतत्=यही, मनः = मन, च=भी है, संज्ञानम्=सम्यक् ज्ञान शक्ति, आज्ञानम्= आज्ञा देनेकी शक्ति, विज्ञानम्=विभिन्न रूपसे जाननेकी शक्ति, प्रज्ञानम्=तत्काल जाननेकी शक्ति, मेधा= धारण करनेकी शक्ति, दृष्टिः = देखनेकी शक्ति, धृतिः = धैर्य, मतिः = बुद्धि, मनीषा = मनन शक्ति, जूतिः = वेग, स्मृतिः = स्मरण शक्ति, संकल्पः = सङ्कल्प शक्ति, क्रतुः = मनोरथ शक्ति, असुः = प्राण शक्ति, कामः = कामना शक्ति, वशः = स्त्री ससर्ग आदिकी अभिलाषा, इति = इस प्रकार, एतानि = ये, सर्वाणि = सब के सब, प्रज्ञानस्य = स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके, एव = ही, नामधेयानि = नाम अर्थात् उसकी सत्ताके बोधक लक्षण, भवन्ति = हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक् प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है—अर्थात् जो दूसरोपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे सुने हुए पदार्थोंको तत्काल समझ लेनेकी शक्ति, अनुभवको धारण करनेकी शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात् निश्चय करनेकी शक्ति, मननं करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमे कही-से कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण शक्ति, सङ्कल्प शक्ति, मनोरथ शक्ति, प्राण शक्ति, कामना शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा—इस प्रकार जो ये शक्तियाँ है, वे सब की सब उस स्वच्छ

  • केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है ।