भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३११ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं, इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है ॥ २ ॥ एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥ एषः = यह, ब्रह्मा = ब्रह्मा है, एषः = यह; इन्द्रः = इन्द्र है, एषः = यही, प्रजापतिः = प्रजापति है; एते = ये, सर्वे = समस्त, देवाः = देवता, च = तथा, इमानि = ये, पृथिवी = पृथ्वी, वायुः = वायु, आकाशः = आकाश; आपः = जल, और ज्योतींषि = तेज, इति = इस प्रकार; एतानि = ये, पञ्च = पाँच, महाभूतानि = महाभूत, च = तथा, इमानि = ये, क्षुद्रमिश्राणि इव = छोटे-छोटे, मिले हुए से, बीजानि = बीजरूप समस्त प्राणी, च = और, इतराणि = इनसे भिन्न, इतराणि = दूसरे, च = भी, अण्डजानि = अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, च = एव; जारुजानि = जेरसे उत्पन्न होनेवाले, च = तथा, स्वेदजानि = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले, च = और, उद्भिज्जानि = जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले, च = तथा, अश्वाः = घोड़े, गावः = गायें, हस्तिनः = हाथी, पुरुषाः = मनुष्य (ये सब-के-सब मिलकर), यत् = जो, किम् = कुछ, च = भी, इदम् = यह जगत् है, यत् च = जो भी कोई, पतत्रि = पाँखोंवाला, च = और, जङ्गमम् = चलने-फिरनेवाला; च = और, स्थावरम् = नहीं चलनेवाला, प्राणि = प्राणिसमुदाय है, तत् = वह, सर्वम् = सब, प्रज्ञानेत्रम् = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और), प्रज्ञाने = उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही, प्रतिष्ठितम् = स्थित है लोकः = (यह समस्त) ब्रह्माण्ड, प्रज्ञानेत्रः = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान शक्तियुक्त है, प्रज्ञा = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही प्रतिष्ठा = इस स्थितिका आधार है, प्रज्ञानम् = यह प्रज्ञान ही, ब्रह्म = ब्रह्म है ॥ ३ ॥ व्याख्या-इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचो महाभूत-जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं, तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से बीजरूपमे स्थित समस्त प्राणी; तथा उनसे भिन्न दूसरे भी-अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य-ये सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है, जो भी कोई पखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं-वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमे समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामे ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिमे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञान- स्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करने- वाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं-यह निश्चय हुआ ॥ ३ ॥ स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्सम- भवत् ॥ ४ ॥ सः = वह, अस्मात् = इस, लोकात् = लोकसे, उत्क्रम्य = ऊपर उठकर; अमुष्मिन् = उस, स्वर्गे लोके = परम धाममे, एतेन = इस, प्रज्ञेन आत्मना = प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित, सर्वान् = सम्पूर्ण, कामान् = दिव्य भोगोको, आप्त्वा = प्राप्त होकर, अमृतः = अमर, समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ४ ॥