भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

३०६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदमदर्शमिती ३ ॥ १३ ॥ जातः सः = मनुष्यरूपमें प्रकट हुए उस पुरुषने, भूतानि = पञ्च महाभूतोंकी अर्थात् भौतिक जगत्की रचनाको; अभिव्यैख्यत् = चारों ओरसे देखा, ( और ) इह = यहाँ, अन्यम् = दूसरा, किम् = कौन है; इति = यह, वावदिषत् = कहा; सः = ( तब ) उसने, एतम् = इस, पुरुषम् = अन्तर्यामी परम पुरुषको, एव = ही, ततमम् = सर्वव्यापी, ब्रह्म = परब्रह्मके रूपमे, अपश्यत् = देखा, (और यह प्रकट किया) [ अहो ] इति ३ = अहो ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि; इदम् = इस परब्रह्म परमात्माको, अदर्शम् = मैने देख लिया ॥ १३ ॥ व्याख्या-मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारो ओरसे देखा और मन ही-मन इस प्रकार कहा---'इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है ? क्योकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई-न कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये।' इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके रूपमे प्रत्यक्ष किया । तब वह आनन्दमें भरकर मन ही-मन कहने लगा--'अहो ! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैने परब्रह्म परमात्माको देख लिया-साक्षात् कर लिया।' इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता भर्ता परमात्माकी सत्तामे विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हे जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है । परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य शरीरसे ही हो सकता है, दूसरे शरीरसे नहीं । अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये । इस अध्यायमे मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके लिये ही सृष्टि रचनाका वर्णन किया गया है ॥ १३ ॥ तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥ तस्मात् = इसीलिये, इदन्द्रः नाम = वह 'इदन्द्र' नामवाला है, ह = वास्तवमे; इदन्द्रः नाम वै = वह 'इदन्द्र' नामवाला ही है, ( परतु ) इदन्द्रम् = इदन्द्र; सन्तम् = होते हुए ही, तम् = उस परमात्माको; परोक्षेण = परोक्षभावसे ( गुप्त नामसे ), इन्द्रः = 'इन्द्र', इति = यों, आचक्षते = पुकारते हैं, हि = क्योकि, देवाः = देवतालोग, परोक्षप्रियाः इव = मानो परोक्षभावसे कही हुई बातको पसद करनेवाले होते हैं, हि देवाः परोक्षप्रियाः इव = देवतालोग मानो परोक्षभावसे कही हुई बातोंको ही पसद करनेवाले होते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम 'इदन्द्र' है। अर्थात् 'इदम्+द्र. = इसको मैंने देख लिया' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उनका 'इदन्द्र' नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम 'इदन्द्र' ही है, फिर भी लोग उन्हें परोक्षभावसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं, क्योकि देवतालोग मानो छिपाकर ही कुछ कहना पसद करते हैं। 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' इस अन्तिम वाक्यको दोबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है ॥ १४ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ ❖ॐ❖