भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 832 में से

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पृष्ठ 331
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०५

सः = (तत्र) उस (सृष्टिके रचयिता परमेश्वर) ने, ऐक्षत = सोचा कि, नु = निश्चय ही; इदम् = यह; मत् ऋते = मेरे बिना, कथम् = किस प्रकार, स्यात् = रहेगा, इति = यह सोचकर; ( पुनः ) सः = उसने, ऐक्षत = विचार किया कि, यदि = यदि; वाचा = ( उस पुरुषने मेरे बिना ही केवल) वाणीद्वारा, अभिव्याहृतम् = बोलने की क्रिया कर ली; यदि = यदि; प्राणेन = प्राण-इन्द्रियद्वारा, अभिप्राणितम् = सूंघनेकी क्रिया कर ली, यदि = यदि, चक्षुषा = नेत्रद्वारा, दृष्टम् = देख लिया; यदि = यदि, श्रोत्रेण = कर्ण-इन्द्रियद्वारा, श्रुतम् = सुन लिया, यदि = यदि, त्वचा = त्वक्-इन्द्रियद्वारा, स्पृष्टम् = स्पर्श कर लिया; यदि = यदि, मनसा = मनद्वारा, ध्यातम् = मनन कर लिया; यदि = यदि, अपानेन = अपानद्वारा; अभ्यपानितम् = अवग्रहण आदि अपान-सम्बन्धी क्रिया कर ली (तथा) यदि = यदि; शिश्नेन = उपस्थसे, विसृष्टम् = मूत्र और वीर्यका त्याग कर लिया; अथ = तो फिर; अहम् = मैं, कः = कौन हूँ; इति = यह सोचकर, (पुनः) सः = उसने; ऐक्षत = विचार किया कि, कतरेण = (पैर और मस्तक—इन दोनोंमेंसे) किस मार्गसे, प्रपद्यै इति = मुझे इसमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ११ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य शरीरधारी पुरुषने उस आहारको ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्रष्टा परमात्माने फिर विचार किया—'यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा ? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा ?'* साथ ही यह भी विचार किया कि 'यदि मेरे महयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा बोलनेकी क्रिया करली, प्राण-इन्द्रियसे सूँघनेका काम कर लिया, प्राणोंमें वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रेन्द्रियद्वारा देख लिया, कर्णेन्द्रियद्वारा सुन लिया, त्वक् इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया, और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर ली, तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया ? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है।' यह सोचकर परमात्माने विचार किया कि मे इस मनुष्य शरीरमें पैर और मस्तक—इन दोमेंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ ? ॥ ११ ॥ स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्धतिर्नाम द्वारस्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः, अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ (यों विचारकर ) सः = उसने, एतम् एव = इस (मनुष्य शरीर की), सीमानम् = सीमाको, विदार्य = चीरकर; एतया द्वारा = इसके द्वारा, प्रापद्यत = उस सजीव शरीर मे प्रवेश किया, सा = वह; एषा = यह; द्वाः = द्वार, विद्धतिः नाम = विदृति नामसे प्रसिद्ध है; तत् = वही, एतत् = यह; नान्दनम् = आनन्द देनेवाला अर्थात् ब्रह्म प्राप्तिका द्वार है; तस्य = उस परमेश्वरके; त्रयः = तीन; आवसथाः = आश्रय (उपलब्धि-स्थान) हैं; त्रयः = तीन, स्वप्नाः = स्वप्न हैं, अयम् = यह (हृदय-गुहा ); आवसथः = एक स्थान है; अयम् = यह ( परमधाम ), आवसथः = दूसरा स्थान है; अयम् = यह ( सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ); आवसथः इति = तीसरा स्थान है ॥ १२ ॥ व्याख्या-परमात्मा इस मनुष्य शरीरकी सीमा ( मूर्धा ) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चीरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमे प्रविष्ट हो गये। वह यह द्वार विदृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विदृति नामका द्वार ( ब्रह्मरन्ध्र ) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान है और स्वप्न भी तीन है। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका स्थान है। दूसरा विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है—जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न है ॥ १२ ॥

  • इसीलिये तो भगवान्ने गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो ( १० । ३९) । उ० अ० ३९-४०-
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