भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ तैत्तिरीयोपनिषद् यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाके अन्तर्गत तैत्तिरीय आरण्यकका अङ्ग है । तैत्तिरीय आरण्यकके दस अध्याय हैं । उनमेंसे सातवें, आठवें और नवें अध्यायोंको ही तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है । शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ आगे प्रथम अनुवाकमे दिया गया है । शिक्षा-वल्ली* प्रथम अनुवाक ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ॐ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है । नः=हमारे लिये, मित्रः=( दिन और प्राणके अधिष्ठाता ) मित्र देवता, शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों ( तथा ), वरुणः=( रात्रि और अपानके अधिष्ठाता ) वरुण ( भी ), शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों, अर्यमा= ( चक्षु और सूर्य-मण्डलके अधिष्ठाता ) अर्यमा, नः=हमारे लिये, शम् भवतु=कल्याणकारी हों, इन्द्रः=( बल और भुजाओंके अधिष्ठाता ) इन्द्र (तथा), बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति, नः=(दोनों) हमारे लिये, शम् [भवताम्]= शान्ति प्रदान करनेवाले हों, उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले, विष्णुः=विष्णु ( जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं ), नः= हमारे लिये, शम् [ भवतु ]=कल्याणकारी हों, ब्रह्मणे=( उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप ) ब्रह्मके लिये, नमः= नमस्कार है, वायो=हे वायुदेव, ते=तुम्हारे लिये, नमः=नमस्कार है, त्वम्=तुम, एव=ही, प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष ( प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले ), ब्रह्म=ब्रह्म; असि=हो, (इसलिये मैं) त्वाम्=तुमको, एव=ही, प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष, ब्रह्म=ब्रह्म, वदिष्यामि=

  • इस प्रकरणमें दी हुई शिक्षाके अनुसार अपना जीवन बना लेनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोकके सर्वोत्तम फलको पा सकता है और ब्रह्मविद्याको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है—इस भावको समझानेके लिये इस प्रकरणका नाम शिक्षावल्ली रक्खा गया है ।