कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- कहूँगा, ऋतम्= ( तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैं तुम्हे ) ऋत नामसे, वदिष्यामि=पुकारूँगा, सत्यम्= ( तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैं तुम्हें) सत्य नामसे, वदिष्यामि= कहूँगा तत्=वह (सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ), माम् अवतु= मेरी रक्षा करे, तत्=वह; वक्तारम् अवतु = वक्ताकी अर्थात् आचार्यकी रक्षा करे, अवतु माम्=रक्षा करे मेरी, (और) अवतु वक्तारम्=रक्षा करे मेरे आचार्यकी, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः = भगवान् शान्तिस्वरूप है, शान्तिस्वरूप हे शान्तिस्वरूप हे । व्याख्या - इस प्रथम अनुवाकमे भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थना की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा -अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों । हमारी उन्नतिके मार्गमें और अपनी प्राप्तिके मार्गमे किसी प्रकारका विघ्न न आने दे । हम सबके अन्तर्यामी उन ब्रह्मको नमस्कार करते हैं । इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमे समस्त प्राणियोमे व्याप्त उन परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं- हे सर्वशक्तिमान् सबके प्राणस्वरूप वायुमन परमेश्वर ! तुम्हे नमस्कार है । तुम्हीं समस्त प्राणियोके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, अतः मैं तुम्हींको प्रत्यक्ष ब्रह्मके नामसे पुकारूँगा । मे 'ऋत' नामसे भी तुम्हे पुकारूँगा, क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके तुम्हीं अधिष्ठाता हो । तथा मैं तुम्हे 'सत्य' नामसे पुकारा करूँगा, क्योकि सत्य ( यथार्थ भाषण) के अधिष्ठातृ-देवता तुम्हीं हो । वे सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर मुझे सत् आचरण एवं सत्य- भाषण करनेकी और मृत-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप ससार चक्रसे मेरी रक्षा करें, तथा मेरे आचार्यको इन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा करें। यहाँ 'मेरी रक्षा करें', 'वक्ताकी रक्षा करें'-इन वाक्योको दुबारा कहनेका अभिप्राय शान्तिपाठकी समाप्तिको सूचित करना है । ओम् शान्ति, शान्ति, शान्ति - इस प्रकार तीन बार कहनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय । भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है । ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः । शीक्षाम् व्याख्यास्यामः = अब हम शिक्षाका वर्णन करेंगे, वर्णः = वर्ण, स्वरः = स्वर मात्राः = मात्रा, बलम् = प्रयत्न, साम = वर्णोंका सम वृत्तिसे उच्चारण अथवा गान करनेकी रीति, (और) संतानः = संधि इति = इस प्रकार, शीक्षाध्यायः = वेदके उच्चारणकी शिक्षारूप अध्याय, उक्तः = कहा गया । व्याख्या-इस मन्त्रमें वेदके उच्चारणके नियमोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संकेतमात्र किया गया है । इससे मालूम होता है कि उस समय जो शिष्य परमात्माकी रहस्य-विद्याका जिज्ञासु होता था, वह इन नियमोंको पहलेसे ही पूर्णतया जाननेवाला होता था, अतः उसे सावधान करनेके लिये संकेतमात्र ही यथेष्ट था । इन संकेतोंका भाव यह प्रतीत होता है कि मनुष्योंको वैसे तो प्रत्येक शब्दके उच्चारणमें सावधानी बरतते हुए शुद्ध बोलनेका अभ्यास रखना चाहिये । पर यदि लौकिक शब्दोंमें नियमोंका पालन नहीं भी किया जा सके तो कम-से-कम वेदमन्त्रोंका उच्चारण तो अवश्य ही शिक्षाके नियमानुसार होना चाहिये । क, ख आदि व्यञ्जन वर्णों और अ, आ आदि स्वर वर्णोंका स्पष्ट उच्चारण करना चाहिये । दन्त्य 'स' के स्थानमें तालव्य 'श' या मूर्धन्य 'ष' का उच्चारण नहीं करना चाहिये । 'ब' के स्थानमें 'व' का उच्चारण नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार अन्य वर्णोंके उच्चारणमें भी विशेष ध्यान रखना चाहिये । इसी प्रकार बोलते समय किस वर्णका किस