कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 832 में से
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- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१५
जगह क्या भाव प्रकट करनेके लिये उच्च स्वरसे उच्चारण करना उचित है, किसका मध्य स्वरसे और किसका निम्न स्वरमे उच्चारण करना उचित है—इस बातका भी पूरा-पूरा ध्यान रखकर यथोचित स्वरसे बोलना चाहिये। वेदमन्त्रोंके उच्चारणमें उदात्त आदि स्वरोंका ध्यान रखना और कहाँ कौन स्वर है—इसका यथार्थ ज्ञान होना विशेष आवश्यक है, क्योंकि मन्त्रोंमें स्वरभेद होनेसे उनका अर्थ बदल जाता है तथा अशुद्ध स्वरका उच्चारण करनेवालेको अनिष्टका भागी होना पड़ता है।* ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इस प्रकार मात्राओंके भेदोंको भी समझकर यथायोग्य उच्चारण करना चाहिये, क्योंकि ह्रस्वके स्थानमे दीर्घ और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व उच्चारण करनेमें अर्थका बहुत अन्तर हो जाता है—जैसे 'सिता और सीता'। बलका अर्थ है प्रयत्न। वर्णोंके उच्चारणमें उनकी ध्वनिको व्यक्त करनेमें जो प्रयास करना पड़ता है, वही प्रयत्न कहलाता है। प्रयत्न दो प्रकारके होते हैं—आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तरके पाँच और बाह्यके ग्यारह भेद माने गये हैं। स्पृष्ट, ईषत् स्पृष्ट, विवृत, ईषद् विवृत, संवृत—ये आभ्यन्तर प्रयत्न हैं। विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—ये बाह्य प्रयत्न हैं। उदाहरणके लिये 'क'से लेकर 'म'तकके अक्षरोंका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट है, क्योंकि कण्ठ आदि स्थानोंमें प्राणवायुके स्पर्शसे इनका उच्चारण होता है। 'क'का बाह्य प्रयत्न विवार, श्वास, अघोष तथा अल्पप्राण है—इस विषयका विशद ज्ञान प्राप्त करनेके लिये व्याकरण देखना चाहिये। वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण या साम गानकी रीति ही साम है। इसका भी ज्ञान और तदनुसार उच्चारण आवश्यक है। सन्तानका अर्थ है सहिता—संधि। स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग अथवा अनुस्वार आदि अपने परवर्ती वर्णके संयोगसे कहीं-कहीं नूतन रूप धारण कर लेते हैं, इस प्रकार वर्णोंका यह संयोजनजनित विकृतिभाव—'संधि' कहलाता है। किसी विशेष स्थलमें जहाँ संधि बाधित होती है, वहाँ वर्णमें विकार नहीं आता, अतः उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि वर्णोंके उच्चारणमे उक्त छहों नियमोंका पालन आवश्यक है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक सम्बन्ध—अब आचार्य अपने और शिष्यके अभ्युदयकी इच्छा प्रकट करते हुए सहिताविषयक उपासनाविधि आरम्भ करते हैं—
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः स५हिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधि- करणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महास५हिता इत्याचक्षते । अथाधि- लोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः । वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् ।
नौ=हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंका, यशः=यश, सह=एक साथ बढे (तथा), सह=एक साथ ही, नौ=हम दोनोंका, ब्रह्मवर्चसम्=ब्रह्म-तेज भी बढे, अथ=इस प्रकार शुभ इच्छा प्रकट करनेके अनन्तर, अतः=यहाँसे, (हम) अधिलोकम्=लोकोंके विषयमे, अधिज्यौतिषम्=ज्योतियोके विषयमे, अधिविद्यम्=विद्याके विषयमे, अधिप्रजम्=प्रजाके विषयमें, (और) अध्यात्मम्=शरीरके विषयमे, (इस तरह) पञ्चसु=पाँच, अधिकरणेषु=स्थानोंमें, संहितायाः=सहिताके, उपनिषदम् व्याख्यास्यामः=रहस्यका वर्णन करेंगे, ताः=इन सब को, महासंहिताः=महासंहिता, इति=इस नामसे, आचक्षते=कहते हैं, अथ=उनमेसे (यह पहली), अधिलोकम्=लोकविषयक सहिता है, पृथिवी=पृथ्वी, पूर्वरूपम्= पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, द्यौः=स्वर्गलोक, उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है, आकाशः=आकाश, संधिः=संधि—मेलसे
- महर्षि पतञ्जलिने महाभाष्यमें कहा है— दुष्ट शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ अर्थात् स्वर या वर्णकी अशुद्धिसे दूषित शब्द ठीक-ठाक प्रयोग न होनेके कारण अभीष्ट अर्थका वाचक नहीं होता। इतना ही नहीं, वह वचनरूपी वज्र यजमानको हानि भी पहुँचाता है। जैसे 'इन्द्रशत्रु' शब्दमें स्वरकी अशुद्धि हो जानेके कारण 'वृत्रासुर' स्वयं ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।