कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंबना हुआ रूप, ( तथा ) वायुः = वायु, संधानम् = दोनोंका संयोजक है; इति = इस प्रकार; ( यह ) अधिलोकम् = लोकविषयक संहिताकी उपासनाविधि पूरी हुई । व्याख्या - इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है । आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते है । वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'मंहिता' कहते हे । वही सरिता दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते ह । सहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है । स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार-ये ही संधि के अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं- लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर) । तात्पर्य यह कि जैसे वर्गोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये । वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है । प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं- पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम । इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें सहिता दृष्टि की जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे- पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान ( संयोजक ) । इस मन्त्रमें लोकविषयक सहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथिवीको देखना चाहिये । इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप ( परवर्ण ) है । आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका सधान ( संयोजक ) है । जैसे पूर्व और उत्तर वर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलाया जाता है ( सम्बद्ध किया जाता है ) - यह भाव हो सकता है । यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है, क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है, परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस सकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौनसे लोककी प्राप्ति की जा सकती है । इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमे प्राणोंकी प्रधानता है । प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है- यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है, किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथिवी पहला वर्ण है और द्युलोक दूसरा वर्ण है एव आकाश संधि (इनका सयुक्त रूप) है-इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक ठीक समझमें नहीं आता । अथाधिज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथ = अथ, अधिज्यौतिषम् = ज्योतिविषयक सहिताका वर्णन करते हैं, अग्निः = अग्नि, पूर्वरूपम् = पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, आदित्यः = सूर्य, उत्तररूपम् = उत्तररूप (परवर्ण) है, आपः = जल-मेघ, संधिः = इन दोनोंकी संधि-मेलसे बना हुआ रूप है, ( और ) वैद्युतः = बिजली, ( इनका ) संधानम् = सधान ( जोड़नेका हेतु ) है, इति = इस प्रकार; अधिज्यौतिषम् = ज्योतिविषयक संहिता कही गयी। व्याख्या- अग्नि इस भूतलपर सुलभ है, अतः उसे सहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है, और सूर्य द्युलोकमें- ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है । इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत् शक्ति ही इस संधिकी हेतु ( सधान ) बतायी गयी है। इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक सहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदाथ.को जलका नाम दियागया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको कारण बताया गया है, ऐसा अनुमान होता है, क्योंकि आजकलके वैज्ञानिकों-