भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 832 में से

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पृष्ठ 343
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१७ ने भी बिजलीसे नाना प्रकारके भौतिक विकास करके दिखाये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेदमे यह भौतिक उन्नतिका साधन भी भलीभाँति बताया गया है, परंतु परम्परानष्ट हो जानेके कारण उसको समझने और समझानेवाले दुर्लभ हो गये हैं। अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳसंधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथ = अब, अधिविद्यम् = विद्याविषयक सहिताका आरम्भ करते हैं, आचार्यः = गुरु, पूर्वरूपम् = पहला वर्ण है; अन्तेवासी = समीप निवास करनेवाला शिष्य, उत्तररूपम् = दूसरा वर्ण है, विद्या = ( दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न ) विद्या; संधिः = मिला हुआ रूप हे, प्रवचनम् = गुरुद्वारा दिया हुआ उपदेश ही, संधानम् = संधिका हेतु है, इति = इस प्रकार ( यह ); अधिविद्यम् = विद्याविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें विद्याके विषयमे सहिता-दृष्टिका उपदेश दिया गया है। इसके द्वारा विद्याप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह हे कि जिस प्रकार वर्णोंकी संधिमे एक पूर्ववर्ण और एक परवर्ण होता है, उसी प्रकार यहाँ विद्या- रूप संहितामें गुरु तो मानो पूर्ववर्ण है और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा करनेवाला विद्याभिलाषी शिष्य परवर्ण है, तथा संधिमें दो वर्णोंके मिलनेपर जैसे एक तीसरा नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार गुरु और शिष्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होने- वाली विद्या—ज्ञान ही यहाँ संधि है। इस विद्यारूप संघिके प्रकट होनेका कारण है—प्रवचन अर्थात् गुरुका उपदेश देना और शिष्यद्वारा उसको श्रद्धापूर्वक सुन समझकर वारण करना, यही सधान है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर विद्वान् गुरुकी सेवा करता है, वह अवश्य ही विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाता है। अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजासंधिः । प्रजननꣳसंधानम् । इत्यधिप्रजम् । अथ = अव; अधिप्रजम् = प्रजाविषयक सहिता कहते है, माता = माता, पूर्वरूपम् = पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है, पिता = पिता, उत्तररूपम् = उत्तररूप (परवर्ण) है, प्रजा = (उन दोनोंके मेलसे उत्पन्न) सतान, संधिः = संधि है, (तथा) प्रजननम् = प्रजनन (सतानोत्पत्तिके अनुकूल व्यापार), संधानम् = सधान (संधिका कारण) है, इति = इस प्रकार (यह), अधिप्रजम् = प्रजाविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें सहिताके रूपमे प्रजाका वर्णन करके सतानप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि इस प्रजा-विषयक संहितामें माता तो मानो पूर्ववर्ण है और पिता परवर्ण है। जिस प्रकार दोनों वर्णोंकी संधिसे एक नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार माता-पिताके सयोगसे उत्पन्न होनेवाली सतान ही इस सहितामे दोनोंकी संधि ( सयुक्त स्वरूप ) है। तथा माता और पिताका जो ऋतुकालमे शास्त्रविधिके अनुसार यथोचित नियमपूर्वक सतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे सहवास करना है, यही सधान (पुत्रोत्पत्तिका कारण) है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर सतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकालमें धर्मयुक्त स्त्रीसहवास करता है, वह अवश्य ही अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ सतान प्राप्त कर लेता है। अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्यध्यात्मम् । अथ = अब, अध्यात्मम् = आत्मविषयक महिताका वर्णन करते हैं, अधरा हनुः = नीचेका जबड़ा, पूर्वरूपम् = पूर्व रूप (वर्ण) है, उत्तरा हनुः = ऊपरका जबड़ा, उत्तररूपम् = दूसरा रूप (वर्ण) है, वाक् = (दोनोके मिलनेसे उत्पन्न) वाणी, संधिः = सधि है, (और) जिह्वा = जिह्वा, संधानम् = सधान (वाणीरूप सधिकी उत्पत्तिका कारण) है, इति = इस प्रकार (यह); अध्यात्मम् = आत्मविषयक सहिता कही गयी । व्याख्या—इस मन्त्रमें शरीर-विषयक सहिता दृष्टिका उपदेश किया गया है। शरीरमे प्रधान अङ्ग मुख है, अतः मुखके ही अवयवोंमे संहिताका विभाग दिखाया गया है। तात्पर्य यह कि नीचेका जबड़ा मानो सहिताका पूर्ववर्ण है, ऊपरका जबड़ा परवर्ण है, इन दोनोंके सयोगसे इनके मध्यभागमें अभिव्यक्त होनेवाली वाणी ही संधि है और जिह्वा ही सधान (वाणी- रूप संघिके प्रकट होनेका कारण) है, क्योंकि जिह्वाके बिना मनुष्य कोई भी शब्द नहीं बोल सकता। वाणीमें विलक्षण शक्ति