भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 832 में से

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पृष्ठ 344

३१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है । वाणीद्वारा प्रार्थना करके मनुष्य शरीरके पोषण और उसे उन्नत करनेकी सभी सामग्री प्राप्त कर सकता है । तथा ओङ्कार- रूप परमेश्वरके नाम जपसे परमात्माको भी प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार वाणीमे शारीरिक और आत्मविषयक-दोनों तरह- की उन्नति करनेकी सामर्थ्य भरी हुई है । इस रहस्यको समझकर जो मनुष्य अपनी वाणीका यथायोग्य उपयोग करता है, वह वाक्शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन । इति = इस प्रकार, इमाः = ये, महासंहिताः = पाँच महासंहिताएँ कही गयी ह, यः = जो मनुष्य, एवम् = इस प्रकार; एताः = इन; व्याख्याताः = ऊपर बतायी हुई, महासंहिताः = महासंहिताओंको, वेद = जान लेता है; (वह) प्रजया = सन्तानसे, पशुभिः = पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, अन्नाद्येन = अन्न आदि भोग्य पदार्थोसे (और) सुवर्गेण = स्वर्गरूप; लोकेन = लोकसे, संधीयते = सम्पन्न हो जाता है । व्याख्या - इस मन्त्रमें पाँच प्रकारसे कही हुई महासंहिताओंके यथार्थ ज्ञानका फल बताया गया है । इनको जानने- वाला अपनी इच्छाके अनुकूल संतान प्राप्त कर सकता है, विद्याके द्वारा ब्रह्मतेज सम्पन्न हो जाता है, अपनी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके पशुओंको और अन्न आदि आवश्यक भोग्य पदार्थोंको प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी हो जाती है । इनमेंसे लोकविषयक सहिताके ज्ञानसे स्वर्ग आदि उत्तम लोक, ज्योति-विषयक सहिताके ज्ञानसे नाना प्रकारकी भौतिक सामग्री, प्रजाविषयक संधिके ज्ञानसे संतान, विद्याविषयक सहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्म- सहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति-इस प्रकार पृथक् पृथक् फल समझना चाहिये । श्रुतिमे समस्त संहिताओंके ज्ञानका सामूहिक फल बताया गया है । श्रुति ईश्वरकी वाणी है, अतः इसका रहस्य समझकर श्रद्धा और विश्वासके साथ उपर्युक्त उपासना करनेसे निस्सन्देह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है । ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । यः = जो, छन्दसाम् = वेदोंमें, ऋषभः = सर्वश्रेष्ठ है, विश्वरूपः = सर्वरूप है, (और) अमृतात् = अमृतरूप, छन्दोभ्यः = वेदोंसे, अधि = प्रधानरूपसे, सम्बभूव = प्रकट हुआ है, सः = वह (ओङ्कारस्वरूप) इन्द्रः = सबका स्वामी (परमेश्वर), मा = मुझे, मेधया = धारणाद्युक्त बुद्धिसे, स्पृणोतु = सम्पन्न करे देव = हे देव, (मैं आपकी कृपासे) अमृतस्य धारणः = अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला, भूयासम् = बन जाऊँ, मे = मेरा; शरीरम् = शरीर, विचर्षणम् = विशेष फुर्तीला-सब प्रकारसे रोगरहित हो, (और) मे = मेरी, जिह्वा = जिह्वा, मधुमत्तमा = अतिशय मधुमती (मधुरभाषिणी), [भूयात् = हो जाय,] कर्णाभ्याम् = (मैं) दोनों कानोंद्वारा, भूरि = अधिक, विश्रुवम् = सुनता रहूँ, (हे प्रणव ! तू) मेधया = लौकिक बुद्धिसे, पिहितः = ढकी हुई, ब्रह्मणः = परमात्माकी, कोशः = निधि, असि = है, (तू) मे = मेरे, श्रुतम् गोपाय = सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर । व्याख्या - इस चतुर्थ अनुवाकमें 'मे श्रुतम् गोपाय' इस वाक्यतक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये आवश्यक