भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 832 में से

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पृष्ठ 345
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१९ बुद्धिबल और शारीरिक बलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे परमेश्वरसे उनके नाम ओंकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि 'ओम्' यह परमेश्वरका नाम वेदोक्त जितने भी मन्त्र हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है और सर्वरूप है, क्योंकि प्रत्येक मन्त्रके आदिमे ओंकारका उच्चारण किया जाता है और ओंकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण वेदोंके उच्चारणका फल प्राप्त होता है। तथा अविनाशी वेदोंसे यह ओंकार प्रधानरूपमे प्रकट हुआ है। ओंकार नाम है और परमेश्वर नामी, अतः दोनों परस्पर अभिन्न है। वे प्रणवरूप परमात्मा सबके परमेश्वर होनेके कारण 'इन्द्र' नामसे प्रसिद्ध है। वे इन्द्र मुझे मेधासे सम्पन्न करें। 'धीर्धारणावती मेधा' इस कोषवाक्यके अनुसार धारणाशक्तिसे सम्पन्न बुद्धिका नाम मेधा है। तात्पर्य यह कि परमात्मा मुझे पढे और समझे हुए भावोंको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न करे। हे देव ! मै आपकी अहैतुकी कृपासे आपके अमृतमय स्वरूपको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर रोगरहित रहे, जिससे आपकी उपासनामें किसी प्रकारका विघ्न न पड़े। मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती अर्थात् मधुर स्वरसे आपके अत्यन्त मधुर नाम और गुणोंका कीर्तन करके उनके मधुर रसका आस्वादन करनेवाली बन जाय। मै अपने दोनों कानोंद्वारा कल्याणमय बहुतसे शब्दोंको सुनता रहूँ, अर्थात् मेरे कानोंमें आचार्यद्वारा वर्णन किये हुए रहस्यको पूर्णतया सुननेकी शक्ति आ जाय और मुझे आपका कल्याणमय यश सुननेको मिलता रहे। हे ओंकार ! तू परमेश्वरकी निधि है, अर्थात् वे पूर्णब्रह्म परमेश्वर तुझमे भरे हुए हैं, क्योंकि नामी नामके ही आश्रित रहता है। ऐसा होते हुए भी तू मनुष्योंकी लौकिक बुद्धिसे ढका हुआ है-लौकिक तर्कसे अनुसन्धान करनेवालोंकी बुद्धिमे तेरा प्रभाव व्यक्त नहीं होता। हे देव ! तू सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर अर्थात् ऐसी कृपा कर कि मुझे जो उपदेश सुननेको मिले, उसे मैं स्मरण रखता हुआ उसके अनुसार अपना जीवन बना सकूँ। सम्बन्ध-अब ऐश्वर्यकी कामनावालेके लिये हवन करनेके मन्त्रोंका आरम्भ करते है— आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासांसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा । ततः = उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव !), [या श्रीः = जो श्री,] मम = मेरे, आत्मनः = अपने लिये, अचीरम् = तत्काल ही, वासांसि = नाना प्रकारके वस्त्र, च = और, गावः = गौएँ, च = तथा, अन्नपाने = खाने-पीनेके पदार्थ, सर्वदा = सदैव, आवहन्ती = ला देनेवाली, वितन्वाना = उनका विस्तार करनेवाली, [च = तथा,] कुर्वाणा = उन्हें बनानेवाली है, लोमशाम् = रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि पशुओसे युक्त, पशुभिः सह = (तथा अन्य) पशुओंके सहित; [ताम्] श्रियम् = उस श्रीको, मे = (तू) मेरे लिये, आवह = ले आ, स्वाहा = स्वाहा (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)। व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अङ्गमें 'ततः' पदसे लेकर 'आवह स्वाहा' यहाँतक ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर ! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एव अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका साधनरूप धन मुझे प्रदान कर। इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमे आहुति देनी चाहिये, ˗ यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है। सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है— आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, मा = मेरे पास; आयन्तु = आयें, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति दी