भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 832 में से

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पृष्ठ 346

३२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जाती है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, विमायन्तु = कपटशून्य हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, प्रमायन्तु = प्रामाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हो, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, दमयन्तु = इन्द्रियोका दमन करनेवाले हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग. शमायन्तु = मनको वशमे करनेवाले हों; स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)। व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे शिष्योके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढनेके लिये आये' इस उद्देश्यने मन्त्र पढकर 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे, 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढकर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हो' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमे करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति दे। सम्बन्ध—आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये जिस प्रकार हवन करना चाहिये, उसकी विधि बतायी जाती है-- यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे नि भगाहं त्वयि मृजे स्वाहा। जने = लोगोंमें (मै), यशः = यशस्वी, असानि = होऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः = महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी, श्रेयान् = अधिक धनवान्; असानि = हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), भग = हे भगवन्, तम् त्वा = उस आपमें, प्रविशानि = मै प्रविष्ट हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है), भग = हे भगवन्!, सः = वह (तू); मा = मुझमें, प्रविश = प्रविष्ट हो जा, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यमे यह आहुति है), भग = हे भगवन्!, तस्मिन् = उस, सहस्रशाखे = हजारो शाखावाले; त्वयि = आपमे, (ध्यानद्वारा निमग्न होकर) अहम् = मै, निमृजे = अपनेको विशुद्ध कर लूँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)। व्याख्या-चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्यको 'लोगोंमें मै यशस्वी बनूँ, जगत्में मेरा यश सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो' इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमे डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय-मेरे मनमे बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन् ! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमे ध्यानद्वारा निमग्न होकर मै अपने आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमे डालनी चाहिये। यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ यथा = जिस प्रकार, आपः = (नदी आदिके) जल, प्रवता = निम्न स्थानसे होकर; यन्ति = समुद्रमें चले जाते हैं, यथा = जिस प्रकार, मासाः = महीने, अहर्जरम् = दिनोंका अन्त करनेवाले सम्वत्सररूप कालमे, [यन्ति = चले जाते हैं,]